बुधवार, 13 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.2

1.2
कैसे होता है आरंभ कविता से जीने का

मेरी युवावस्था के दिनों में मेरे सहपाठी और समकालीन लोग पास्तरनाक के बेहद दीवाने थे. पास्तरनाक की कविता को पहली बार मेरे घर लाया था खोल्मिन. बसंत के रास्तों पर कितनी बार मैं घूमी हूँ उन सम्मोहित करते शब्दों को दुहराते हुए जो पूरी तरह मुझ तक न तो पहुँचे थे, न ही समझ में आए थे.
अपनी नीली आँखों को आधा मूँदे, येसेनिन जैसे सुनहरे बालों को जानबूझकर बिखेरते हुए खोल्मिन पास्तरनाक के संकलन “बहन मेरी ज़िन्दगी” और “बाधाओं से ऊपर” से कविताएँ सुनाता. मुझे ऐसा लगता था कि वो किसी और के उन्माद के प्रभाव में प्रलाप कर रहा है! और तब से दिमाग में रह गई है रात में भटकते हुए मुसाफ़िर की वह शोकपूर्ण स्वीकारोक्ति:
नहीं है ये वो शहर, ना ही है वो रात
भटक गया है तू, दूत उसका!

उस समय मैं कह नहीं पाती थी कि आधी बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है, मगर मंत्रमुग्ध सी खोल्मिन के मुँह की ओर देखती रहती. मगर अपनी संवेदना से मैं तभी से समझ गई थी कि ये ‘ख़ुदा’ के शब्द गूँज रहे हैं, सर्वशक्तिमान ‘तफ़सील के ख़ुदा’ के शब्द, सर्वशक्तिमान ‘प्यार के ख़ुदा’ के शब्द.
फिर हुई मेरी पहली दक्षिण की यात्रा, मेरी पहली यात्रा सागर की. खोल्मिन ने, जो मुझे छोड़ने आया था, मुझे पास्तरनाक के गद्य की छोटी सी किताब पकड़ा दी - हल्के गुलाबी-जामुनी रंग की, खुरदुरे कवर की लम्बी स्कूल-एक्सरसाईज़ बुक की शकल की. ये थी ‘ल्युवेर्स का बचपन’. ऊपर की बर्थ पर लेटे हुए, मैंने फिर से असाधारण तक पहुँचने के लिए संकेत-शब्द ढूँढ़ने की ज़िद्दी कोशिश की: एक मर्द किसी युवती की रहस्यमय दुनिया में इस तरह प्रवेश कैसे कर सका?
सोची के सेनिटोरियम में आने के बाद मैं अक्सर एकांत में इस आश्चर्यजनक किताब के साथ रहती थी. उस समय की अपनी बेवकूफ़ी भरी कविताओं में मैंने लिखा था: 
पास्तरनाक के गद्य के बादल
और मेरे सपने छाए हैं मेरी मेज़ पे...
.
मैं आज भी समझ नहीं सकती कि युवावस्था में ही इस अविश्वसनीय, क्लिष्ट आविष्कार की गहराई में पैंठने की मेरी इच्छा कैसे हुई. बस, मैं खिंचती गई.
युवावस्था से ही गुमिल्योव से बेहद प्रभावित, तब मैं पास्तरनाक के पास उनकी एक पंक्ति लेकर गई थी, जिसने मुझ पर जादू कर दिया था:
अद्भुत संदिग्धता की सौगात मिली है तुझे कवि...
फिर मुझे यक़ीन हो गया कि जब उनके अत्यंत कठिन काव्यात्मक प्रतीकों को समझने की ज़रा सी भी असमर्थता के कारण  उन्हें ‘संदिग्धता’ की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता और बोरिस लिओनीदोविच को इसका दोष दिया जाता, तो वे बहुत गुस्सा हो जाते थे.
उनकी राय में, इन प्रतीकों की स्पष्टता और उनके बीच के संबंध के रहस्य को सिर्फ वही व्यक्ति महसूस नहीं कर सकता था जो कविता के प्रति बहरा हो, या फिर जिस पर साहित्यिक परंपराओं ने लगाम लगाई हो, पहली नज़र में बन्दी प्रतीत होते प्रतीकों और रूपकों को अपनी ही चाभी से आज़ाद करना जिसके बस के बाहर हो. और अगर वो उन्हें आज़ाद न कर पाता हो, तो अपनी इस असमर्थता को छुपाने के लिए, बेवजह ही चुगली करने वाले लेख न लिखे.      
कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी उस अज्ञात का रहस्य सम्मोहित करता था, जो अब तक अनसुलझा और अप्राप्य था. काव्यात्मक प्रतीकों का भेद खोलने में सबसे बड़ी बाधा थी - पर्याप्त तैयारी का अभाव, और उन्हीं साहित्यिक परंपराओं का प्रभाव. मगर समस्या का समाधान आसपास ही मौजूद था : बसंत – कपड़ों की छोटी सी पोटली / “अस्पताल से छुट्टी पाए मरीज़ की”. बसंती वृक्षों की टहनियों पर चिपके मोम के शेष टुकड़े को – कलियों का नाम देना ज़रूरी नहीं है! और बिन-होठों की पत्ती, शिशिर की दूत, और बगीचे की स्तम्भों वाली रचना, जो आसमान को थामे हुए हो... – सब कुछ आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट था. हाँ, ये कोई जादू था, और चमत्कार भी, और हो सकता है महान कवि को प्रदत्त “संदिग्धता”. ऐसा लगता था जैसे तुम्हारे ही द्वारा अब तक ‘अज्ञात’ का आविष्कार होगा, जिसे ख़ुदा ने एक बन्द दरवाज़े के पीछे तुमसे छुपा कर रखा है. उन महान तोहफ़ों को लेने में हाथ अभी झिझक रहे हैं, कमज़ोर हैं, मगर महानता से देने वाले और नम्रता से लेने वाले के बीच का संबंध – स्थापित हो चुका था.                

पोतापोव्स्काया स्ट्रीट वाले मेरे छोटे से कमरे में इन ख़ूबसूरत जटिलताओं को समझने की दिशा में मेरे पहले क़दम बढ़ रहे थे. फिर आश्चर्यजनक रूप से सही और सरल उत्तर प्राप्त हो गए....

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