रविवार, 17 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.3

1.3
....बेचैन ख़ुदा

मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सन् 1946 की ओर लौटती हूँ.
संपादकीय ऑफ़िस में ख़ुदा से मुलाक़ात के दूसरे दिन मैं संपादक मंडल की मीटिंग से हमारे लाल कमरे में हमेशा की अपेक्षा काफ़ी देर से लौटी. ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने, जो प्रवेश द्वार के पास अपनी सचिव वाली कुर्सी पर बैठी थी, कहा:
 “आपका प्रशंसक यहाँ आया था, देखिए वो आपके लिए क्या छोड़ गया है.”
मेज़ पर अख़बारी कागज़ में लिपटा हुआ पैकेट पड़ा था: कविताओं और अनुवादों की पाँच छोटी-छोटी किताबें.
फिर तो हर चीज़ ख़तरनाक तूफ़ान की गति से बढ़ती गई. बोरिस लिओनीदोविच लगभग हर रोज़ मुझे फोन करते, और मैं, अपने अंतर्मन में उनसे मिलने और बात करने से घबराते हुए, ख़ुशी से सन्न, बेतरतीब सा जवाब देती: “आज मैं व्यस्त हूँ”. मगर लगभग हर रोज़ दफ़्तर का समय ख़त्म होते होते वो ख़ुद संपादकीय दफ़्तर में प्रकट हो जाते और अक्सर हम लोग गलियों से, राजमार्ग से, स्क्वेयर्स से होते हुए पैदल- पैदल पोतापोव्स्काया मार्ग तक आते.
 “अगर आप चाहें तो मैं आपको ये स्क्वेयर तोहफ़े में दे दूँ? नहीं चाहतीं?” मैं, बेशक, चाहती.
एक बार उन्होंने संपाद्कीय दफ़्तर में फोन किया और कहा:
 “क्या आप मुझे अपना कोई और टेलिफोन नंबर दे सकतीं हैं, मतलब, किसी पड़ोसी का, मेरा दिल आपसे सिर्फ दिन में ही नहीं, शाम को भी बातें करना चाहता है.”
ओल्गा निकोलायेव्ना वोल्कोवाया का टेलिफोन नंबर देना पड़ा, जो हमारे फ्लैट से एक मंज़िल नीचे रहती थी. पहले मैंने ऐसा कभी नहीं किया था.
और फिर शाम को गरम पानी के पाईप पर टक्-टक् होने लगी – मुझे मालूम हो जाता कि ये निचली मंज़िल के फ्लैट से ओल्गा निकोलायेव्ना मुझे बुला रही है.
बी.एल. (बोरिस लिओनीदोविच – अनु.) किन्हीं गूढ़ विषयों से एक अंतहीन बात शुरू करते. कुछ चालाकी से, जैसे बातों-बातों में वो दुहराते: “अपने फूहड़पन के बावजूद, मैं कई बार औरतों को रुलाने का कारण बना हूँ...”
और अब, ऐसा लगा, जैसे वो फिर से पुराने इतिहास से गुज़र रहे हैं, जब उन्हें किसी मैडम वी. के ट्यूटर के रूप में काम करना पड़ा था. इस किस्से का वर्णन “सुरक्षित दस्तावेज़” में किया गया है. न जाने क्यों, मैं उनकी पहली प्रेमिका की याद दिलाती थी. उसे “बालों की कंघी से पैरों तक” वह “”शेक्सपियर के नाटक की तरह” “मुँहज़बानी” जानते थे. उसने इनकार कर दिया. और उसके इनकार ने मेरे प्रीतम को सिसकते हुए कहने पर मजबूर किया:
(कितनी सुन्दर हो तुम!) – ये दमघोंटू बवण्डर –
क्या कह रहे हो? होश में आओ! ख़त्म हो गया. ठुकरा दिया.”
वी. के रिश्तेदारों को नौजवान कवि की अस्थिर ज़िन्दगी से परहेज़ था और उन्होंने वी. को इनकार करने पर मजबूर कर दिया. कहते हैं – वो भयानक ग़रीबी में मरी.
“मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी मेरी वजह से रोना पड़े. मगर हमारी मुलाक़ात बेकार नहीं जाएगी – न तुम्हारे लिए, न मेरे लिए.”
घर पहुँचकर मैंने बी.एल. को कविता लिखी:
पहले दिन से अधमुँदी पलकों को,
मुश्किल से खोला ही था मैंने,
और जिसने – प्यार नहीं था किया तुमको
आ गई मुझसे बाँटने...
टेलिफोन के तार, गुज़रते हैं
तुम्हारे और मेरे ऊपर से
गुज़र गई तूफ़ान की तरह तेरी जवानी
ख़ुदा में विश्वास न करते देश के ऊपर से...
और इसी तरह का कुछ और.
आधे मॉस्को से गुज़रती इन लम्बी सैरों के दौरान हमारी बातचीत काफ़ी गड्ड्-मड्ड् होती थी और उसको लिख कर रखना असंभव था. बी.एल. को अपने दिल का “बोझ हल्का करना” होता था और, मैं बस घर पहुँचती ही थी कि गर्म पानी वाले धातु के पाईप से खट्-खट् की आवाज़ आने लगती. मैं, सिर धुनते हुए, फिर से निचली मंज़िल पर अधूरी बातचीत की तरफ़ भागती, और बच्चे विस्मय से मेरी ओर देखते रहते.
जल्दी ही “नोवी मीर” में एक जवान, प्यारी, अपरिचित ज़नाना आवाज़ ने मुझे फोन किया. ये ल्यूस्या पोपोवा थी जो बोरिस लिओनीदोविच के कहने पर फोन कर रही थी. जल्दी ही वह मुझसे मिलने घर पर आई. छोटी सी, भूरे बालों वाली गुड़िया, उसका चेहरा लिओनार्दो की परी जैसा था. ये ड्रामा-इन्स्टीट्यूट के एक्टिंग विभाग की विद्यार्थिनी थी, जो बाद में पेंटर बन गई. सन् 1944 में पॉलिटेक्निक-म्यूज़ियम में हुई काव्य-संध्या के बाद वह निर्गम-द्वार के पास पास्तरनाक का इंतज़ार कर रही थी, और जैसे ही वो बाहर निकले उनके पास अपना परिचय देने के लिए गई. मगर अपने ही साहस से वह इतना घबरा गई, इतनी गड़बड़ा गई कि कुछ-कुछ अनाप-शनाप कहने लगी. बी.एल. ने अपने बेटे से उसका परिचय करवाया और हौसला देती मुस्कुराहट से (जैसे वह ख़ुद ही कुछ भी कहने में असमर्थ हैं, न कि लड़की) कहा: “मैं थक गया हूँ और आपकी किसी भी बात का जवाब नहीं दे सकता, मुझे माफ़ कीजिए. ये रहा मेरा टेलिफोन नंबर, मुझे फोन कर लीजिए, हम मिलकर बात करेंगे. गुड लक.” और जाते जाते मुड़ कर बोले, “फोन ज़रूर कीजिए, बेहतर है बुधवार को...”

और इसके बाद ल्यूस्या ने मुझे टेलिफोन करने की कहानी सुनाई:

 “एक बार मुझे बी.एल. का एक पोस्ट-कार्ड मिला: आ जाईये,” उन्होंने लिखा था, “मेरा आपसे मिलना बहुत ज़रूरी है.”

मैं उनके पास गई. उनका चेहरा ऐसा दमक रहा था, जैसे बर्थ-डे बॉय का होता है:

 “आप जानती हैं, ल्यूस्या,” उन्होंने दमकते हुए कहा, “मुझे प्यार हो गया है.”

 “अब आप की ज़िन्दगी का क्या होगा, बोरिस लिओनीदोविच?” मैंने ज़िनाईदा निकोलायेव्ना के चेहरे की कल्पना करते हुए पूछा.

 “ हाँ, ज़िन्दगी में रखा क्या है, क्या रखा है ज़िन्दगी में, अगर प्यार नहीं है तो?” उन्होंने जवाब दिया.  “और वो इतनी सम्मोहक है, वो इतनी ख़ुशनुमा है, इतनी सुनहरी है. अब मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश किया है इस सुनहरे सूरज ने, ये इतना अच्छा है, इतना अच्छा है. नहीं जानता था कि मैं अभी भी ऐसी ख़ुशी महसूस करूँगा. वो ‘नोवी मीर’ में काम करती है. मैं चाहता हूँ कि आप उसे फोन करें और उससे मिलें.”

 “बेशक, हम मिलेंगे,” मैंने दमकते बोरिस लिओनीदोविच से कहा.

और मैंने ‘नोवी मीर’ में फोन किया.

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