1.3
....बेचैन ख़ुदा
मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सन् 1946 की
ओर लौटती हूँ.
संपादकीय ऑफ़िस में ख़ुदा से मुलाक़ात के
दूसरे दिन मैं संपादक मंडल की मीटिंग से हमारे लाल कमरे में हमेशा की अपेक्षा काफ़ी
देर से लौटी. ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने, जो प्रवेश द्वार के पास अपनी सचिव वाली कुर्सी
पर बैठी थी, कहा:
“आपका प्रशंसक यहाँ आया था, देखिए वो आपके लिए
क्या छोड़ गया है.”
मेज़ पर अख़बारी कागज़ में लिपटा हुआ पैकेट
पड़ा था: कविताओं और अनुवादों की पाँच छोटी-छोटी किताबें.
फिर तो हर चीज़ ख़तरनाक तूफ़ान की गति से
बढ़ती गई. बोरिस लिओनीदोविच लगभग हर रोज़ मुझे फोन करते, और मैं, अपने अंतर्मन में
उनसे मिलने और बात करने से घबराते हुए, ख़ुशी से सन्न, बेतरतीब सा जवाब देती: “आज
मैं व्यस्त हूँ”. मगर लगभग हर रोज़ दफ़्तर का समय ख़त्म होते होते वो ख़ुद संपादकीय
दफ़्तर में प्रकट हो जाते और अक्सर हम लोग गलियों से, राजमार्ग से, स्क्वेयर्स से
होते हुए पैदल- पैदल पोतापोव्स्काया मार्ग तक आते.
“अगर आप चाहें तो मैं आपको ये स्क्वेयर तोहफ़े
में दे दूँ? नहीं चाहतीं?” मैं, बेशक, चाहती.
एक बार उन्होंने संपाद्कीय दफ़्तर में फोन
किया और कहा:
“क्या आप मुझे अपना कोई और टेलिफोन नंबर दे
सकतीं हैं, मतलब, किसी पड़ोसी का, मेरा दिल आपसे सिर्फ दिन में ही नहीं, शाम को भी
बातें करना चाहता है.”
ओल्गा निकोलायेव्ना वोल्कोवाया का टेलिफोन
नंबर देना पड़ा, जो हमारे फ्लैट से एक मंज़िल नीचे रहती थी. पहले मैंने ऐसा कभी नहीं
किया था.
और फिर शाम को गरम पानी के पाईप पर
टक्-टक् होने लगी – मुझे मालूम हो जाता कि ये निचली मंज़िल के फ्लैट से ओल्गा
निकोलायेव्ना मुझे बुला रही है.
बी.एल. (बोरिस लिओनीदोविच – अनु.)
किन्हीं गूढ़ विषयों से एक अंतहीन बात शुरू करते. कुछ चालाकी से, जैसे बातों-बातों
में वो दुहराते: “अपने फूहड़पन के बावजूद, मैं कई बार औरतों को रुलाने का कारण बना
हूँ...”
और अब, ऐसा लगा, जैसे वो फिर से पुराने
इतिहास से गुज़र रहे हैं, जब उन्हें किसी मैडम वी. के ट्यूटर के रूप में काम करना
पड़ा था. इस किस्से का वर्णन “सुरक्षित दस्तावेज़” में
किया गया है. न जाने क्यों, मैं उनकी पहली प्रेमिका की याद दिलाती थी. उसे “बालों
की कंघी से पैरों तक” वह “”शेक्सपियर के नाटक की तरह” “मुँहज़बानी” जानते थे. उसने
इनकार कर दिया. और उसके इनकार ने मेरे प्रीतम को सिसकते हुए कहने पर मजबूर किया:
(कितनी
सुन्दर हो तुम!) – ये दमघोंटू बवण्डर –
क्या कह
रहे हो? होश में आओ! ख़त्म हो गया. ठुकरा दिया.”
वी. के रिश्तेदारों को नौजवान कवि की
अस्थिर ज़िन्दगी से परहेज़ था और उन्होंने वी. को इनकार करने पर मजबूर कर दिया. कहते
हैं – वो भयानक ग़रीबी में मरी.
“मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी मेरी वजह
से रोना पड़े. मगर हमारी मुलाक़ात बेकार नहीं जाएगी – न तुम्हारे लिए, न मेरे लिए.”
घर पहुँचकर मैंने बी.एल. को कविता लिखी:
पहले दिन से अधमुँदी पलकों को,
मुश्किल से खोला ही था मैंने,
और जिसने – प्यार नहीं था किया तुमको
आ गई मुझसे बाँटने...
टेलिफोन के तार, गुज़रते हैं
तुम्हारे और मेरे ऊपर से
गुज़र गई तूफ़ान की तरह तेरी जवानी
ख़ुदा में विश्वास न करते देश के ऊपर से...
और इसी तरह का कुछ और.
आधे मॉस्को से गुज़रती इन लम्बी सैरों के
दौरान हमारी बातचीत काफ़ी गड्ड्-मड्ड् होती थी और उसको लिख कर रखना असंभव था.
बी.एल. को अपने दिल का “बोझ हल्का करना” होता था और, मैं बस घर पहुँचती ही थी कि
गर्म पानी वाले धातु के पाईप से खट्-खट् की आवाज़ आने लगती. मैं, सिर धुनते हुए,
फिर से निचली मंज़िल पर अधूरी बातचीत की तरफ़ भागती, और बच्चे विस्मय से मेरी ओर
देखते रहते.
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