भाग - 1
1.1
नोवी मीर*
* नोवी मीर (नई दुनिया) रूस की एक प्रमुख
साहित्यिक पत्रिका है, जिसका आरंभ 1925 में हुआ था.
मैं अपनी जीवनी नहीं लिखता.
उससे मुख़ातिब मैं तब होता हूँ
जब कोई और जीवनी उसकी मांग करती है.
बोरिस
पास्तरनाक
आह भरके, कहती हूँ अपने आपसे,
दोपहर की निर्मम
चकाचौंध में:
मैं गुनहगार सही,
बुरी ही सही,
मगर तुमने किया था
मुझसे प्यार!
पूश्किन स्क्वेयर
सन् 1946 के
अक्टूबर में ‘नोवी मीर’ का संपादकीय दफ़्तर ‘इज़्वेस्तिया’ की चौथी मंज़िल से पूश्किन
स्क्वेयर के कोने वाली बिल्डिंग में शिफ़्ट हुआ. हमारे इस नये आवास में, हमारे
वर्तमान स्वागत-कक्ष में, किसी ज़माने में आयोजित नृत्योत्सवों में नौजवान पूश्किन नृत्य
किया करते थे.
तो, हम आ गए
हैं नई जगह पर. हमारे यहाँ आने तक फ़ौलादी अलेक्सान्द्र पूश्किन को त्वेर्स्की
राजमार्ग से नहीं घसीटा गया था और वह आधुनिकतावादी सिनेमा थियेटर ‘रसिया’ की
पार्श्वभूमि में लुप्त नहीं हुआ था. काँच के इस महल का अस्तित्व तब था ही नहीं.
हमारे यहाँ आने
के बाद न केवल खिड़कियों से दिखाई देने वाला नज़ारा बदल गया (अब हम स्क्वेयर के
स्थान पर वर्जिन मैरी का चर्च देख सकते थे, जो अपने फूहड़, प्यारे-प्यारे पंजों से
फुटपाथ पर चढ़ आया था), बल्कि हमारा प्रमुख संपादक भी बदल गया. रोएँदार, छैले जैसी
कैप पहने, मोटी छड़ी का सहारा लिए नया संपादक अन्दर आया. श्चेर्बिना के नौसेनिकों
वाले काले कोट की जगह पर सीमोनोव का अमेरिकन स्टाईल का फ़ैशनेबुल कोट लटकने लगा.
नये संपादक की ऊँगलियों में बड़ी-बड़ी अँगूठियाँ थीं. शायद, उसकी पसन्द के अनुसार ही
हॉल को गहरे लाल रंग में पेन्ट किया गया था, कॉर्निस सुनहरी थी. सीमोनोव – मॉस्को
की सभी औरतों का सपना था, हर औरत यही समझती थी कि उसका प्रसिद्ध कविता-संग्रह ‘तेरे
साथ और तेरे बिना’ उसीके लिए लिए लिखा गया है – ‘र’ का उच्चारण फ्रांसिसियों की
तरह बड़ी ख़ूबसूरती से करता था, उसके बाल शानदार थे, ऊदबिलाव जैसे, जिन पर जल्दी ही चांदी
झलकने लगी थी, ढीले-ढाले और फ़ैशनेबल अमेरिकन कोट पहनता, उसे मित्र देशों के
प्रतिनिधियों का तथा युद्ध के मोर्चे पर कुछ समय पहले बने अपने दोस्तों का स्वागत
करना अच्छा लगता था.
ये पहली बार था
कि उसके लिए एक अलग, शानदार ऑफ़िस-कैबिन बनाया गया था, हम – उप संपादकों के लिए
फ़िलहाल अपने-अपने अलग ऑफ़िस-कैबिन नहीं थे; मैं, नये लेखकों के विभाग की उप संपादक
और मेरी सहेली, नताशा बिआन्की, पत्रिका की तकनीकी संपादक, हॉल के काफ़ी अन्दर एक
दूसरे के पास बैठते थे. मेरे पास आने वाले नौजवान लेखक सकुचाते हुए पूरे हॉल को
पार करके मेरी मेज़ तक पहुँचते थे. अक्सर, जब नताशा प्रिंटिंग-सेक्शन में नहीं
भागती थी, बल्कि अपनी जगह पर होती, हमारे पास हमारे पुराने दोस्त आ जाते. ये
पुरानी बिल्डिंग वाले दोस्त थे. ज़िन्दगी गुज़र रही थी, दोस्ती का, सहानुभूति का और
लगाव का लेन-देन करते हुए.
यहाँ छोटे
बच्चों वाले, आधे छपाई के अक्षरों में, अपनी कविता की कॉपी लाया था पतले चेहरे,
सुनहरे–भूरे बालों वाला, नौजवान झेन्या एव्तुशेन्को. यहाँ प्रकट हुई थी
गुलाबी-गुलाबी, भूरी आँखों वाली सुन्दरी, बेला अहमादुल्लिना. वह ग़ज़ब की ताज़गी से
महकती थी, और अन्य रंगों की अपेक्षा उसे सैमन-गुलाबी रंग बेहद पसन्द था. मेरी मेज़
के पास बैठा करती थी वेरोनिका तूश्नोवा. उससे बढ़िया सेंट की मादक ख़ुशबू आती थी, और
वह अपनी तराशी हुई पलकों को यूँ झुकाया करती मानो जीवित गालातेया हो. मेरी उससे पारिवारिक
पहचान थी, उसके पहले पति – मनोचिकित्सक रोगिन्स्की ने मेरे दो साल के बेटे को
मेनिंजाइटिस से बचाया था. आज तक मेरी पास उसकी तस्वीर है जिस पर लिखा है: “ मेरी
प्यारी, भली, मुझे समझने वाली, अद्भुत दोस्त को सस्नेह. वेरोनिका.” उसके साथ मैं
अपने सभी दुख-दर्द बाँटती थी.
ज़िन्दादिल और
मनमौजी अन्तोकोल्स्की मानो उड़ता हुआ आता था, चिकने-चुपड़े बालों की तिरछी मांग बनाए ज़ाबोलोत्स्की आता था, जो उस
कवि जैसा बिल्कुल नहीं था, जिसने अपने लेखन का आरंभ ‘राशि-चक्र के निशानों’ से
किया था; यातना-कैम्प के बाद वह संजीदा हो गया था. अख़बारों में उसके बारे में हुए
शोर-शरावे के बाद यहाँ आया था ज़ोशेन्को - क्रीम-कलर का रेनकोट पहने, विवर्ण मुख,
आँखों के नीचे काले घेरे, सलीकेदार और नौजवानों जैसा सीधा. मुझे याद है कि सीमोनोव
ने बाँहें फैलाकर उसका स्वागत किया था, मुझे डाँट भी पिलाई कि उसके आने की सूचना
फ़ौरन क्यों न दी गई. नए प्रमुख संपादक की बहादुरी से हम कितने प्रभावित हो गए थे!
बाद में पता चला कि इस ‘बहादुरी’ को ‘ऊपर’ से मंज़ूरी मिली थी.
बाद में, जब
पास्तरनाक हमारे संपादन कार्यालय में आने लगे, तो एक दिन मेरी मेज़ पर उन्होंने
फ्रांसीसी भाषा के अनुवादक यूरी शेर को देखा.
“माय गॉड,” बोरिस लियोनीदोविच की आवाज़ गूँजी,
“ये आदमी किस क़दर मुझे बेचारे मिखाईल मिखाईलोविच ज़ोशेन्को की याद दिला रहा है.”
सबने नज़रें झुका लीं, मानो कुछ सुना ही न हो.
मेरा पुराना
सहपाठी, साशा पीस्मेन्नी आया करता; नताशा का भावी पति, ईल्या फ्रेन्केल आता; मेरा
बुज़ुर्ग दोस्त साशा श्पीर्त; मेरा और नताशा का पसन्दीदा कवि निकोलाय असानोव आया
करता जो काफ़ी सलीके से कपड़े पहनात था और मेरी मेज़ पर गुलाबी फूल रखता.
अल्योशा
नेदोगोनोव आया करता. वह बहुत नम्र और प्यारा था, और हम उसके साथ अक्सर मीठी वाईन,
कागोर पीते जो वह पास ही की दवाई की दुकान से लाता था. कठोर चेहरे वाला लुकोनिन
आता; भला, मिलनसार ओशानिन आता, वह थोड़ी देर बैठता और कविताएँ पढ़ता. उस समय उसे
मेरे साहित्यिक प्रभाव पर काफ़ी भरोसा था - और हमारी पत्रिका, जो अपने मित्र बोरिस
के बारे में लिखी उसकी कविता को प्रकाशित कर चुकी थी, ख़ुशी से उसकी नई कविताएँ भी
स्वीकार कर लेती. मासूम, दलदली-मत्स्यकन्या की सरकण्डे के रंग जैसी आँखों वाला
मेझिरोव आता भद्दे फ़ौजी जूते और ग्रेटकोट पहने. वह युद्ध से संबंधित सुन्दर
कविताएँ पढ़ता – पहले-पहले हकलाते हुए, मगर फिर उनमें ऐसे कूद पड़ता जैसे पानी में
कूद रहा हो, और आराम से तैरने लगता, बिना किसी रुकावट के. हमारे उस हॉल को सुशोभित
करने वाली सभी प्रसिद्ध और सामान्य हस्तियों के नाम गिनाना तो संभव नहीं है.
श्चेर्बिना के समय के कुछ लोग भी आते जैसे बोरिस सोलोव्येव, और ख़ास तौर से हम सब
के प्यारे यान साशिन जिसकी आँखें औरतों की आँखों जैसी ख़ूबसूरत थीं. उसका दोस्त जो
बोरियत की हद तक सलीकापसन्द था, रास्किन भी आता जिसके दिल में नताशा के प्रति
स्पष्ट आकर्षण था.
ओसिप च्योर्नी,
अंतोनोव्स्काया, मिखाल्कोव, सेर्गेई वासिल्येव, और अंत में द्मित्री सेदीख, जिसे
भी मेरी ओर से काफ़ी साहित्यिक आशाएँ थीं. सिर्योझा वासिल्येव मुझे अक्सर बियर-बार
में आमंत्रित करता जो स्त्रास्त्नाया रोड के नुक्कड पर खुली थी. वहाँ भी साहित्यिक
योजनाओं पर विचार विमर्श होता. कविताओं के बारे में पूरे दिन बातें करते, कभी किसी
के साथ तो कभी किसी और के साथ. ये वो चीज़ थी जिसमें आप पूरा दिमाग़ झोंक देते हो.
ये युद्धोपरांत का आधा-भूखा, मगर जवान और ख़ुशनुमा समय था. काफ़ी कुछ अभी तक
अनावृत्त नहीं हुआ था, कई उम्मीदें ऐसी थीं जो बुझी नहीं थीं. सिमोनोव ने पहले-पहल
विद्यमान उत्कृष्ट लेखकों को आकर्षित करना चाहा, जैसे कि अन्तोकोल्स्की,
पास्तरनाक, चूकोव्स्की, मार्शक. पास्तरनाक से व्यक्तिगत परिचय के लिए मैं सीमोनोव
की आभारी हूँ.
सीमोनोव के
कार्यकाल के आरंभ में हमारे संपादन-गृह की सचिव ज़िनाईदा निकोलायेव्ना पिद्दूब्नाया
ने, मुझे एक तोहफ़ा दिया. यह एक अधेड़ महिला थी, जिसकी भूतपूर्व सुन्दरता में से
केवल लम्बी, काली आँखें और लम्बी गर्दन ही सलामत बचे थे, जिसके कारण हमने बदतमीज़ी
से उसका नाम साँप रख दिया था. तोहफ़ा था – ऐतिहासिक म्यूज़ियम की लाइब्रेरी में ‘पास्तरनाक
के साथ एक शाम’ का टिकट. वे अपने अनुवादों का पाठ करने वाले थे. मैंने युद्ध के
पहले से ही उन्हें नहीं देखा था. याद है कि आधी रात के बाद, जब मैं घर वापस लौटी
तो गुस्से से बड़बड़ाती हुई माँ को, जिसे मुझे दरवाज़ा खोलने के लिए उठना पड़ा था, मैंने
कहा था:
“मैं अभी-अभी ख़ुदा से बातें करके आई हूँ, मुझे
परेशान मत करो!” उसने हाथ झटक दिया और सोने चली गई.
सुबह, मुझे याद है, कि मैं नताशा के पास यह
बताने के लिए गई. मगर उसका ‘मूड’ नहीं था और उसने कुछ चुभती हुई टिप्पणियाँ कीं.
वो अक्सर हमारे इस कविता-प्रेम की हँसी उड़ाया करती थी. लाइब्रेरी वाली शाम को अपने
ही दिल में दुहराना पड़ा. पहली बार मैंने पास्तरनाक को इतने नज़दीक से देखा था.
ख़ूबसूरत
कदकाठी, दिखने में आश्चर्यजनक रूप से जवान, गहरी, नीची आवाज़, मज़बूत, जवान गर्दन,
श्रोताओं से इस तरह मुख़ातिब हो रहे थे जैसे किसी घनिष्ठ मित्र से बात कर रहे हों
और पढ़ इस तरह रहे थे जैसे अपने आप को या अपने घनिष्ठ मित्र को सुना रहे हों,
बुदबुदाते हुए, फिर से उन्हें दुहराते हुए. कुछ गिनेचुने ख़ुशनसीब लोगों ने अंतराल
में उनसे विनती की कि वे अपनी कोई रचना सुनाएँ, मगर उन्होंने मना कर दिया, अपनी
गहरी आवाज़ में कुछ अजीब सी बुदबुदाहट के साथ शब्दों को समाप्त करते हुए कहा, कि ये
शाम तो, फ़िलहाल शेक्सपियर के नाम है, न कि उनके नाम. मगर, ज़ाहिर था, कि उन्होंने
कुछ लोगों को, जो रुक गए थे, अपनी कविताएँ सुनाई थीं. मैं तो रुकने का साहस न कर
पाई, चली आई.
’नोवी मीर’ के
द्फ़्तर में मिलने से पहले मैंने पास्तरनाक को सिर्फ एक बार देखा था. मज़ेदार बात
हुई थी: जब हम सबको, जो कोम्सोमोल्स्क की पत्रिका ‘स्मेना’ से संबंधित साहित्यिक
ग्रुप में काम करते थे, शानदार जॉर्जियाई कवि गम्साखुर्दिया ने मेट्रोपोल हॉटेल के
अपने कमरे में बुलाया था, मैं वहाँ से भाग आई थी, ये सुनकर कि मेज़बान पास्तरनाक का
इंतज़ार कर रहा है (रात का एक बज चुका था). हो सकता है कुछ पूर्वाभास हुआ हो? उनके
साथ एक ही मेज़ पर बैठने के ख़याल से ही घबरा गई थी मैं, पावेल वासिल्येव और
स्मेल्याकोव के साथ छोटी बच्ची के समान भाग खड़ी हुई. वे दोनों, शराफ़त से मुझे घर
पहुँचाकर मेट्रोपोल में वापस लौट आए थे.
एक और मौके पर,
जब मैं लिटरेचर-फैकल्टी में पढ़ ही रही थी, मेरा सहपाठी नीका खोल्मिन, जिसके साथ
मेरा अल्हड़ अवस्था का पहला संजीदा प्यार चल रहा था, मुझे घसीटकर गेर्त्सेन-हाऊस ले
गया, उसी बुल्गाकोव की मासोलित में, जहाँ उत्तेजित प्रशंसकों का हुजूम युवा,
बिन्दास पास्तरनाक का इंतज़ार कर रहा था, जो अभी तक ‘मेरी बहन ज़िन्दगी’ के आवेश और
ज़ख़्मों को महसूस कर रहा था, साहित्यिक परंपराओं की ‘बाधाओं के ऊपर’ से जा रहा था.
वह ‘मारबुर्ग’ सुनाने जा रहा था, ‘कौए के
पंखों जैसे’ बाल बिखरे हुए थे. तालियों का जवाब उसने कुछ अप्रसन्न बुदबुदाहट से
दिया, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि स्टेज के पार्श्व में हुई किसी बात से परेशान था.
खोल्मिन ने वादा किया कि वो निकट से पास्तरनाक को दिखाएगा, और वह मुझे कॉरीडोर में
ले गया. मगर तभी इंटरवल ख़त्म होने की घंटी बजी, और उस शाम की एक ही याद साथ रही:
आधे अंधेरे कॉरीडोर में मेरे क़रीब से काले बालों वाला, उत्तेजित व्यक्ति गुज़रा,
ज़ाहिर था कि उसने अभी-अभी अपने आप को किसी औरत के कामुक हाथों से छुड़ाया है, और वो
ख़ुद भी बिखरा हुआ और उत्तेजित था. जोशीले चुम्बनों की प्रतिध्वनि स्टेज तक उसका
पीछा कर रही थी. मैं अपने साथ हॉल में, जहाँ मुझे नीका वापस घसीटकर ले गया था, इन
विचित्र आवाज़ों को लेकर आई थी. मतलब, इसने अपनी किसी प्रशंसक का चुम्बन लिया है,
शायद उसका, जिसकी आँखें काली हैं, जो बाद में अपनी चौड़ी किनार वाली हैट पहने दूसरी
पंक्ति में आकर बैठ गई थी. बाद में मेरे सामने हर बात से इन्कार कर दिया: “ख़ुदा
तुम्हें सज़ा देगा ल्याल्युशा!...”
बाद में, जब ये
शाम ख़त्म हुई तो भीड़ ने पास्तरनाक को घेर लिया, उसके रूमाल की चिंधी-चिंधी हो गई,
उसकी सिगरेटें मसल दी गईं.
काफ़ी बाद में,
जब बी.एल., एरेनबुर्ग और मैं पॉलिटेक्निक इन्स्टीट्यूट में हुई ज़बर्दस्त
काव्य-संध्या से लौट रहे थे, तो ईल्या ग्रिगोरेविच ने कहा: “ख़ुदा करे, बोर्या कि
इस ख़तरनाक कामयाबी से तुम सही-सलामत निकल जाओ”.
******
उन पुराने
दिनों की उनकी एक तस्वीर मुझे पतले से ‘संकलन’ में मिली. ये एक ग़ज़ब का लम्बा चेहरा
था एक छोटी सी नाक के साथ जो चेहरे के अनुपात में नहीं थीं, और नीग्रो जैसे ताँबे
के रंग के होंठ. वैसे तस्वीर के थमेपन में पास्तरनाक की कल्पना करना मुश्किल है,
और उनके चित्रों पर यक़ीन भी नहीं करना चाहिए. इसलिए नहीं करना चाहिए कि उनके चेहरे
पर हमेशा प्रकट होती थी अंतर में सुलगती आग, बच्चों जैसे हाव-भाव, जिसका मुझे यक़ीन
हो गया जब वह वास्तविक रूप में सीमोनोव के निमंत्रण पर ‘नोवी मीर’ के संपादकीय
दफ़्तर में आए.
कैसे थे वो उस
समय? तस्वीर के साथ समानता बिल्कुल भी नहीं थी. हाँ, ख़ूबसूरती और नफ़ासत से भीतर को मुड़ी हुई शानदार नाक, ज़्यादा ही लम्बे,
ज़िद्दी, मर्दाने, किसी सरदार के मज़बूत जबड़े वाले मुँह के साथ मेल नहीं खाती थी.
फ़ौरन यक़ीन हो जाता था – अगर ‘किस’ करेगा – ‘तो ‘अपने होठों के ताँबे से’. चेहरे का
रंग गहरा गुलाबी, किसी स्वस्थ्य आदमी की धूप की झुलस जैसा. आँखों का रंग किसी बाज़
की पीली आँखों जैसा, मगर इस सबके साथ उनमें औरतों जैसी नफ़ासत भी थी.
विचित्र
अफ्रिकन देव यूरोपियन पोषाक में. शायद वो देव जिसके लिए तिब्बती लामा आग जलाया
करते थे..
तो, अक्तूबर के
एक तेवर बदलते हुए दिन में गहरे-लाल कमरे में, कालीन बिछे रास्ते पर गर्मियों के
सफ़ेद रेनकोट में वो ख़ुदा प्रकट हुआ, और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया.
चालीस के दशक
के उन दिनों में उसके घोड़े जैसे पीले दाँत, जिनके बीचोंबीच दरार थी, उसके गज़ब के
चेहरे को एक अलग ही शोभा दे रहे थे. सन् छियालीस के उनके रूप के बारे में लिखना
मेरे लिए मुश्किल है, क्योंकि बाद में वो शानदार रूप से ख़ूबसूरत हो गए थे, और इस
बात से बच्चों जैसे ख़ुश भी हो जाते थे. ये सही है कि इससे अपनी पूरी ज़िन्दगी की
बेतरतीबी का यक़ीन दिलाने वाला उनका छैलापन ख़त्म हो गया.
तो, सर्वशक्तिमान
टेक्नोलॉजी ने उनके अफ्रीकन जबड़े को बदल दिया और हल्का बना दिया. दाँत, जो किसी के
भी दाँतों जैसे नहीं थे, बाद में – कितना अपरिचित लग रहा था! – विदेश में बनाए हुए
मज़बूत और ख़ूबसूरत दाँतों से बदल दिए गए.
सन् उन्नीस सौ
उनसठ में, ख़ुशी से अपने आप को आईने में देखते हुए, अपनी असाधारण ख़ूबसूरती से
चकाचौंध हुए और अपने नकली दाँतों समेत मृत्यु की ओर बढ़ते हुए – मानो ये हमेशा से
ही ऐसा था – और, हो सकता है, मेरे सामने और अपने आप के सामने हल्के सी ‘पोज़’ बनाते
हुए कई बार कहते: “सब कुछ कितनी देर से मिला! ख़ूबसूरती भी, और प्रसिद्धी भी!”
मगर वो ख़ुद
नहीं मानते थे कि देर हो चुकी है!
मगर तब,
संपादकीय दफ़्तर के कालीन बिछे रास्ते से मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश करते हुए,
उन्होंने जिस बात से चौंकाया वो था जंगली, सदोष, सटीक शिल्प जैसा व्यक्तित्व –
जिसे ऐसे प्रतिभावान शिल्पी ने गढ़ा था जिसे नियमों और अनुपातों का कोई ज्ञान नहीं
था. इस प्रतिभावान शिल्पी की छैनी से निकला था वो इन्सान जो किसी जाति का नहीं था,
कनपटी तक जाती भौहों के नीचे जड़ी कुछ तिरछी, चमकदार आँखों वाला इन्सान, वो इन्सान
जो पूरी दुनिया के कैनवास पर विचरण करने वाला था.
मतलब, उनके रूप
को, जो उनकी ख़ुद की पसन्द के अनुरूप था, सिर्फ थोड़े से तकनीकी सुधार की आवश्यकता
थी. जबड़े को थोड़ा छोटा करना पड़ा, प्राचीन ख़ुदा के ताँबे के होठों के नीचे एकदम एक
से अमेरिकन दाँत बिठाने थे – और ये रहे, पचास के दशक के पास्तरनाक.
मगर तब...
हमारे कमरे में
आया था सन् छियालीस का पास्तरनाक.
मैं खिड़की के
पास खड़ी थी – मैं नताशा के साथ लंच के लिए निकलने ही वाले थी.
ज़िनाईदा
निकोलायेव्ना ने बड़ी अदा से चुम्बन के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते
हुए कहा:
“बोरिस लियोनीदोविच, मैं आपका परिचय आपकी एक
ज़बर्दस्त प्रशंसक से करवाती हूँ,” और इसी तरह का कुछ और भी कहा.
और वो खड़ा था
खिड़की के पास वाली मेरी मेज़ के साथ – वो ही, दुनिया का सबसे दिलदार इन्सान जिसे
बादलों के, सितारों के और हवा के नाम से बोलने का अधिकार प्राप्त था, जिसने मर्द
के आवेग और औरत की कमज़ोरी के बारे में ऐसे शब्द खोज निकाले थे जो अमर हो गए थे.
कितना
आनन्ददायक है उन अद्भुत उड़ानों में हिस्सा लेना जो सितारों के बागों तक जाकर सीधे अन्न-नलिका
में उतरती हैं, जहाँ तमाम प्यारभरी रातों की बुलबुलों द्वारा निगले गए ये तारे
फिसल रहे हैं! लोग उसके बारे में कहते भी थे: सितारों को
अपनी मेज़ पर बुलाता है, दुनिया को – उसके पलंग के पास बिछे कालीन पर.
तब उसके बारे
में कौन क्या कहता था, यह जानने की मुझे ज़रूरत नहीं थी! ये तो मैं फिर से अपने आप
के लिए कह रही हूँ, अपने आप को ही बता रही हूँ. कितनी ख़ुशी, कितना भय और कितनी
उथल-पुथल मेरी ज़िन्दगी में लेकर आया ये इन्सान...
अक्तूबर की
हल्की और महीन बर्फ गिर रही थी. मैं अपने युद्धपूर्व के गिलहरी की खाल वाले कोट
में दुबकी थी. कमरे में ठण्ड थी.
बी.एल. (बोरिस
लिओनीदोविच – अनु.) ने मेरे हाथ पर झुककर पूछा कि उसकी कौन सी किताबें मेरे
पास हैं. मगर मेरे पास तो बस एक बड़ा सा संकलन था, जिस पर श्चेर्बिना के समय के
साहित्यिक आलोचक बोरिस सोलोव्येव के हाथ से लिखा था : “ल्युस्या को बोरिस की ओर
से, मगर उसके प्रिय, इस किताब के लेखक की ओर से नहीं...”.
कैसी बेवकूफ़ी
थी! मगर ये, जो “वो बोरिस नहीं” था, बड़ी अच्छी तरह से दूसरे, मेरे प्रिय, बोरिस को
जानता था! हालाँकि उस दिनों नीका ने मुझे सिखाने की बहुत कोशिश की थी, जिसके
फलस्वरूप कविता के नियमों को समझे बगैर मैं उनके आकर्षण से सराबोर हो गई थी, मगर
इसमें सोलोव्येव की भी भूमिका थी, और हालाँकि मतों और पसन्द में मैं उससे कभी की
दूर हो चुकी थी – फिर भी इस बारे में उसकी आभारी हूँ. ग़ज़ब की स्मरणशक्ति होने के
कारण वह पास्तरनाक की अत्यंत क्लिष्ट चीज़ों को मुँह ज़ुबानी सुनाया करता और
प्रसन्नता एवम् अत्यंत सरलता से रूपकों के गुच्छों को सुलझाया करता; एक धागा खींचो
– पूरा गुच्छा खुल जाता है.
तो, मैंने
बोरिस लिओनीदोविच को जवाब दिया कि मेरे पास उनकी बस एक ही किताब है.
उन्हें अचरज
हुआ:
“ठीक है, मैं आपको लाकर दूँगा, हालाँकि मैंने
सारी किताबें बाँट दी हैं! आजकल मैं अनुवाद कर रहा हूँ, अपनी कविता तो क़रीब-क़रीब
नहीं लिखता. शेक्सपियर पे काम कर रहा हूँ. और मालूम है, एक गद्यात्मक उपन्यास के
बारे में सोचा है, मगर अभी पता नहीं वो किस तरह का होगा. पुराने मॉस्को में जाने
को जी चाहता है, जिसकी आपको याद नहीं होगी, कला के बारे में सोचने को,
विचार-विमर्श करने को जी चाहता है.”
और फिर, मुझे
याद है, कि थोड़ा सा झिझकते हुए कहा: “कितनी दिलचस्प बात है कि अभी भी मेरे प्रशंसक
हैं.”
याद नहीं है कि
मैंने उन्हें क्या जवाब दिया. मगर जब नताशा ने मुझे लंच के लिए पुकारा तो मैंने
कड़वाहट से जवाब दिया:
“बस करो, प्लीज़, क्या देख नहीं रही हो कि मैं
व्यस्त हूँ!”
“आह, ख़ुदा,” उसने ज़हरीलेपन से कहा और अकेली ही
लंच करने चली गई.
बी.एल.
संपादकीय दफ़्तर में कुछ ही देर रुके. उन्होंने ज़िनाईदा हिकोलायेव्ना पीद्दूब्नाया से
किसी बारे में बात की, मेरा और उसका हाथ चूमा और चले गए.
पूर्वाभास नामक
चीज़, वाक़ई में, होती है, और यह सिर्फ बड़े परिवर्तनों का आभास ही नहीं होता – मुझे
पूर्वाभास ने बुरी तरह झकझोर दिया था, जो मेरे ख़ुदा की नज़र से मेरे आर-पार हो गया
था.
ये ऐसी
आधिकारिक, ऐसी तौलती हुई सी, ऐसी मर्दाना नज़र थी, कि ग़लती हो ही नहीं सकती थी: वो इन्सान
आ गया था, वही एक इन्सान, जिसकी मुझे ज़रूरत थी, वह, जो स्वयम् मेरे साथ था. ये एक
चौंकाने वाला चमत्कार था.
घर लौटी फिर से
भयानक उलझन लिए.
घर पर थी माँ और
बच्चे: सात साल की ईरोच्का और घुंघराले बालों वाला, गुबगुबा बच्चा मीत्या. पीछे थे
कितने सारे भयानक हादसे: ईरा के पिता - ईवान वासिल्येविच एमिल्यानोव - की आत्महत्या,
मेरे दूसरे पति - अलेक्सान्द्र पेत्रोविच विनोग्रादोव - की मौत मेरे हाथों में ‘ओद्दीख’
स्टेशन के अस्पताल में. माँ की अप्रत्याशित और बेवकूफ़ी भरी तीन साल की कैद (स्टालिन
के बारे में किसी से कुछ कह बैठी थी). चाहत के और निराशाओं के कई किस्से थे.
और इस सब की, शायद,
ज़रूरत थी, उस इकलौते महत्वपूर्ण और निर्विवाद सत्य का स्पष्ट एहसास होने के लिए: मेरे
सुदूर के सोलहवें साल से निकल कर आ गया है वो जादूगर - वास्तविक और जीवित..
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