रविवार, 24 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.4


1.4
“मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते...”

सन् 1947 आ पहुँचा. चार जनवरी को मुझे चिट्ठी मिली:
 “एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएँ. दूर से ही मुझे शुभकामनाएँ दीजिए (कल्पना में) कि मैं जल्दी से “हैम्लेट”  और “1905” को दुहरा सकूँ और उसमें सुधार करने के बाद फिर से अपना काम शुरू कर सकूँ.
आप बेहद ख़ूबसूरत हैं, और मेरी ख़्वाहिश है कि आप ख़ुश रहें.
बी.एल.”
बोरिस पास्तरनाक की पहली चिट्ठी – रेखाओं पर उड़ते हुए सारस – वे पहली बार उड़कर मेरे पास आए थे...मगर उनके पंखों में कुछ ठण्डापन था: मेरे अंतर्मन से मैं कुछ और की भी अपेक्षा कर रही थी, कुछ ज़्यादा गर्मजोशी से भरे शब्दों की, संदेह में डाल रहा था : “काम शुरू कर सकूँ...” जैसे मुझे दूर ठेला जा  रहा हो, मुझ पर प्रतिबन्ध?...     
नए साल की मेज़ पर मेरे साथ थे बच्चे, मम्मा, दिमित्री इवानोविच...और यह चिट्ठी.
इस बीच संपादक दफ़्तर में कुछ मुश्किलें शुरू हो गईं. हाल ही में कंसंट्रेशन कैम्प से लौटे ज़ाबोलोत्स्की की कविताओं की पैरवी मैंने इतनी ज़्यादा हिम्मत से की, जितनी मुझसे उम्मीद नहीं थी. इसके अलावा, पत्रिका के लिए सीमोनोव द्वारा सोचे गए नए स्तम्भ, ‘साहित्यिक पल’ के न बन पाने के कारण उसके सहायक – क्रीवित्स्की के साथ कई बार मेरी झड़प भी हो गई थी. इस स्तम्भ के अंतर्गत समकालीन कवियों को ‘उसी पल’ लिखी गई कविताएँ देनी होती थीं.
मुझे याद है कि बी.एल. अपनी कविता “शीत ऋतु की शाम” लाए थे (श्वेत रंग है वसुंधरा पर...). यह कविता जब हम मारिया विन्यामिनोव्ना यूदिना के घर गए थे, उसके बाद लिखी गई थी. मुझे याद है कि मुझे और लीदिया कोर्नेयेव्स्काया चुकोव्स्काया (वह ‘नोवी मीर’ में साहित्यिक सलाहकार थी) को बहुत गुस्सा आया था: सीमोनोव ने पास्तरनाक को छापने का वादा किया था, मगर नहीं छापा, और, संपादक के कैबिन में घबराहट से घूमते हुए, ये यक़ीन दिला रहा था कि “शीत ऋतु की शाम” के लिए अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल दे देता. मगर फिर भी उसने यह कविता नहीं छापी, और वो स्तम्भ भी बिखर गया. मगर “शीत ऋतु की” वो शमा, कई-कई बार, सीमोनोव की उस समय की कविताओं में जलती रही.
संपादकीय दफ्तर में उत्पन्न कठिनाईयों के बारे में मुझे बी. एल. को बताना पड़ा. वहाँ लोग समझ गए थे कि बी.एल. के साथ मेरा रिश्ता उस हद को पार कर चुका है जो संपादकीय दफ्तर के कर्मचारी और वहाँ आने वाले लेखक के बीच होता है. क्रीवित्स्की ज़हरीली मुस्कान से फ़ब्तियाँ कसता: “मुझे हैरानी होती है, कि पास्तरनाक के साथ आपकी नज़दीकियों का क्या हश्र होगा?” इसके अलावा, वो ख़ुद भी मेरे नज़दीक आने की कोशिश कर रहा था, संपादकीय दफ़्तर की अन्य महिलाओं के साथ भी वह इसी तरह पेश आता था.
जब मैंने परेशान होकर, और, हो सकता है, कुछ बढ़ाचढ़ाकर अपनी मुसीबतों के बारे में बी.एल. को बताया, तो उन्होंने उत्तेजित होकर कहा: “आपको फ़ौरन वहाँ से हट जाना चाहिए, आपकी देखभाल की ज़िम्मेदारी मैं उठाऊँगा.”
अगले दिन उन्होंने संपादकीय दफ़्तर में फोन किया और कुछ दयनीय स्वर में कहा: “मुझे तुरंत दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में आपसे कहना है. क्या आप फ़ौरन पूश्किन (पूश्किन का स्मारक – अनु.) के पास आ सकती हैं?”
जब मैं स्मारक के पास पहुँची, जहाँ हम अक्सर मिला करते थे, तो उत्तेजित बी.एल. घूम रहे थे.
और अचानक – अजीब सी, असाधारण आवाज़ में बोले:
 “अभी मेरी ओर न देखिए. मैं संक्षेप में आपसे अपनी प्रार्थना कहूँगा: मैं चाहता हूँ कि आप मुझे “तुम” कहें; क्योंकि “आप” अब झूठ हो गया है.”
 “मैं आपको “तुम” नहीं कह पाऊँगी, बोरिस लिओनीदोविच,” मैंने विनती की, “ये मेरे लिए असंभव है, अभी डर लगता है...”
 “नहीं, नहीं, नहीं, आपको आदत हो जाएगी, ठीक है अभी आप मुझे ‘तुम’ न कहिए, चलिए, मैं आपको “तुम” कहूँगा...”
मैं, बेहद परेशान, संपादकीय दफ़्तर में लौटी...महसूस कर रही थी कि कुछ और, बेहद महत्त्वपूर्ण, होने वाला है आज...बिल्कुल आज ही!”
शाम के क़रीब नौ बजे पोतापोव्स्की वाले मेरे घर में गरम पानी वाली बैटरी में जानी-पहचानी टक्-टक् हुई...
 “दूसरी बात तो मैंने तुमसे कही ही नहीं, तुम्हें दूसरी बात बताई ही नहीं,” – उत्तेजित, फुसफुसाती आवाज़ में बी.एल. ने कहा – “और तुमने भी यह जानने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि मैं क्या कहना चाह रहा था. मुझे कहना होगा. तो, पहली बात ये थी कि हमें “तुम’ पर उतरना होगा, और दूसरी, मैं तुमसे प्या-र- करता हूँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मेरे लिए अब यही ज़िन्दगी है. कल मैं संपादकीय दफ़्तर में नहीं आऊँगा, बल्कि तुम्हारे कम्पाऊण्ड की तरफ आऊँगा, तुम उतर कर मेरे पास आना और हम मॉस्को में भटकेंगे.”
मैं घर लौटी और अपनी समूची पीड़ा से, पूरी ईमानदारी से और अपने प्रति निर्ममता से बी.एल. को पत्र लिखा. ये ख़त नहीं, बल्कि स्वीकारोक्ति थी – एक पूरी स्कूली-नोटबुक.
मैंने लिखा कि मेरे पहले पति एमेल्यानोव ने मेरे कारण फाँसी लगा ली; मैंने उसके प्रतिस्पर्धी और दुश्मन विनोग्रादोव से शादी कर ली; विनोग्रादोव के बारे में कई अफ़वाहें फैली थीं. वो काफ़ी सम्मोहक किस्म का और उदार इन्सान था, मगर कुछ लोग ऐसे थे जो इस बात का दावा करते थे कि उसीने मेरी माँ के ख़िलाफ़ शिकायत लिखी थी कि उसने अपने फ्लैट में “लीडर की निंदा” की थी, और मेरी बेचारी मम्मा को तीन साल कैम्प में गुज़ारने पड़े, युद्ध के सबसे भयानक और भुखमरी के सालों में. मगर मैं उसके साथ ही रही (हमारा एक बेटा था, और ईरा से भी वह पिता की ही तरह बर्ताव करता था) और सिर्फ उसकी मौत ने ही इस भयावहता का अंत किया. (सिर्फ उसकी मृत्यु के बाद ही मैं अपनी मम्मा को ढूंढ़ने निकल सकी, बिना टिकट के, फ़ौजी के ग्रेट-कोट में, उस भयानक स्टेशन ‘सूखो-बेज़वोद्नोए’ (सूखा-निर्जल-अनु.) पहुँची, ब्लड-डोनर के रूप में मुझे मिलने वाला स्पेशल राशन उसके लिए ले गई, और उसे वहाँ से निकालने में भी कामयाब हो गई. अपंग और बीमार लोगों को वहाँ से निकालने के कानून का इंतज़ार किया, उन दिनों ये संभव था, और ग़ैरकानूनी तरीक़े से अधमरी मम्मा को मॉस्को ले आई. ज़िन्दगी में काफ़ी कुछ भयानक था. मौतें, आत्महत्याएँ...)”
 “अगर आप,” (मैंने फिर भी ‘आप’ ही लिखा था), आँसुओं की वजह बने थे, तो मैं भी बनी थी! अब आप ही फैसला कीजिए कि आपके “तुमसे प्यार करता हूँ” का, मेरी ज़िन्दगी के इस सबसे बड़े सुख का, क्या जवाब दूँ...”  
अगले दिन मैं नीचे उतरी; बी.एल. हमारे कम्पाऊण्ड के सूखे फ़व्वारे के पास मेरा इंतज़ार कर रहे थे. यहाँ एक मज़ेदार बात हुई. उत्सुकतावश मेरी मम्मा सीढ़ियों वाली खिड़की के पास आई और इतना झुककर देखने लगी कि जब मैं उतरकर बी.एल. के पास आई तो वो बड़े आश्चर्यचकित और उत्तेजित लग रहे थे: “कोई औरत खिड़की से बस गिरते-गिरते बची.”
हमारी मुलाक़ात बहुत संक्षिप्त रही: बी.एल. मेरी नोट-बुक पढ़ने का इंतज़ार न कर सके.
रात साढ़े ग्यारह बजे टक्-टक् की आवाज़ सुनकर मैं फिर से नीचे वाले फ्लैट में उतरी. ओल्गा निकोलायेव्ना के कटु शब्दों ने मेरा स्वागत किया, “ल्युसेन्का, मैंने, बेशक, आपको बुला तो लिया, मगर वाक़ई में बहुत रात हो चुकी है और मिख़ाईल व्लादिमीरोविच सो चुके हैं.”
मुझे बेहद अटपटा लग रहा था, मगर मैं बी.एल. से यह कहने का फ़ैसला न कर सकी कि इतनी रात को फ़ोन न किया करें. उनकी आवाज़ ने मुझे इस सबके ऐवज़ में तोहफ़ा दे दिया, “ ओल्युशा, मैं तुमसे प्यार करता हूँ; आजकल शाम को मैं अकेले रहने की कोशिश करता हूँ और अपनी कल्पना में देखता हूँ कि तुम कैसे संपादकीय दफ़्तर में बैठी हो, न जाने क्यों वहाँ चूहे भाग रहे हैं, कैसे तुम अपने बच्चों के बारे में सोच रही हो. तुम लड़खड़ाते हुए मेरी किस्मत में आई हो. ये नोट-बुक हमेशा मेरे पास रहेगी, मगर तुम्हें मेरे लिए इसकी हिफ़ाज़त करनी होगी, क्योंकि मैं इसे घर में नहीं रख सकता, उसे ढूंढ़ सकते हैं.”
और मैंने वह स्वीकारोक्ति वाली नोट-बुक हिफ़ाज़त से रख दी. दो साल बाद वह एम.जी.बी.(मॉस्को सुरक्षा ब्यूरो) के पूछताछकर्ता के हाथ लग गई.
इस तरह मैंने और बी.एल. ने वो सीमा पार कर ली जिसके बाद हमें हर चीज़ अधूरी लगती, और बस एक ही बात बची थी: एक हो जाना. मगर इस रास्ते पर रुकावटें थीं, लगता था कि वे दूर ही नहीं होंगी.
ये समय था मॉस्को की अंधेरी गलियों और सड़कों पर अंतहीन क़ैफ़ियतों का, भटकनों का. कई बार हम एक दूसरे से जुदा हुए फिर कभी न मिलने के लिए, मगर मिले बिना रह न सके.
मैं रहती थी मम्मा के साथ, उसके पति द्मित्री इवानोविच कोस्त्को के साथ और अपने दो बच्चों के साथ, जिनके पिता अलग अलग थे. दोनों ही कब के गुज़र चुके थे. युद्ध के कारण मेरे बच्चे वास्तविक बचपन से महरूम रह जाते, अगर द्मित्री इवानोविच पिता की तरह उनकी देखभाल न करते. मगर फिर भी बच्चों को अपने अनाथ होने का एहसास था, ख़ासकर बड़ी ईरीना को.
आख़िर वो दिन आया जब बोरिस पास्तरनाक पहली बार मेरे बच्चों के सामने आए. मुझे याद है कि कैसे अपना पतला हाथ मेज़ पर टिकाकर ईरोच्का ने उन्हें कविता सुनाई थी. पता नहीं ये मुश्किल कविता उसने कब याद की थी.
व्यस्त हो तुम अपनी बैलेन्स-शीट में,
सु.कौ.पी.ए.* की शोकांतिका में,
तुम, ओ गायक, फ्लायिंग डचमैन से,
मनचाही कविता के सोपान पे.
तंबुओं का गंदला तूफ़ान,
उमड़ उठा उफ़नती द्वीना की तरह,
जब तुम, ओ, पंखधारी
प्रकट हुए मेरे साथ-साथ.
और तुम, पेट्रोल का बिल लिए?
परेशान और बदहवास मैं,
सोचता हूँ डॉक्टर के बारे में,
लौटा दे जो तुम्हें वापस तुम्हारा आवेश.
मालूम है मुझे, तुम्हारी राह है अनूठी,
मगर कैसे आओगे तुम,
इन पंगुओं के दड़बे से,
इस सच्ची राह पर?
* सु.कौ.पी.ए. (सुप्रीम कौंसिल ऑफ पीपल्स एकोनोमी. जन-अर्थव्यवस्था की उच्चतम कौंसिल.)  
बी.एल. ने एक आँसू पोंछा और ईरिन्का को चूम लिया.  “कैसी गज़ब की हैं इसकी आँखें! ईरोच्का, मेरी तरफ देखो! बिल्कुल ऐसे ही तुम, सीधे मेरे उपन्यास में आ गई हो!”
डॉक्टर झिवागो में लारा की बेटी कातेन्का का वर्णन – ये मेरी ही बेटी का वर्णन है:
 “कमरे में क़रीब आठ साल की लड़की आई दो पतली-पतली चोटियों वाली. पतली-पतली, कोनों तक जाती आँखों में चालाकी का भाव प्रतीत होता था. जब वह हँसती तो उन्हें कुछ ऊपर उठा लेती.”
मगर अपने परिवार के प्रति दया और दुहरी ज़िन्दगी का बोझ बोरिस लिओनीदोविच का दम घोंटने लगते – क्या किया जाए. वो बार बार मुझसे कहते कि अपने फ्लैट में प्रवेश करते हुए, जहाँ बुढ़ाती बीबी उसका इंतज़ार कर रही होती, वो अचानक उसमें रेड राईडिंग हुड को देखने लगते, जो जंगल में रास्ता भूल गई थी, और तलाक़ के लिए सोचे गए शब्द गले में ही अटक कर रह जाते. मगर वो मुझे यक़ीन दिलाते कि पत्नी के प्रति उदासीनता के लिए, बल्कि उसके कठोर चरित्र और खनखनाती आवाज़ से डर के लिए, मैं ज़रा भी दोषी नहीं हूँ. “वह पुलिस-कर्नल के परिवार से है”, गहरी साँस लेते हुए बी.एल. ने कहा. ये सब तो मुझसे मुलाक़ात होने के काफ़ी पहले से ही शुरू हो गया था. ये सब बड़ा अटपटा लगता है.  “ये किस्मत का ही खेल था,” उन्होंने कहा, “ज़िनाईदा निकोलायेव्ना से संबंध के पहले ही साल में मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया – असल में मैं उसे नहीं बल्कि गारिक को पसन्द करता था, (उसके पहले पति – गेन्रिख गुस्तावोविच नैगाऊज़ – का ज़िक्र उन्होंने इसी नाम से किया था) – जिसके पियानो वादन ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. “
 “और जब ज़ीना उसे छोड़कर मेरे पास चली आई तो वह, सनकी आदमी, मुझे जान से मारने चला था! मगर बाद में उसने इसके लिए मुझे बहुत धन्यवाद दिया!”
ये थे – वास्तविक बी.एल. हो सकता है - वो पियानो-वादन से सम्मोहित हो गए, और उस स्वर्गीय सुख की अनुभूति के पल में उन्हें महसूस हुआ हो कि ऐसी स्थिति सिर्फ किसी औरत के लिए गहरे प्यार के कारण उत्पन्न हुई है.
और, दो परिवार टूट गए, बड़ी मुश्किल से वो अपनी पहली पत्नी येव्गेनिया व्लादीमिरोव्ना और नन्हे बेटे से अलग हुए और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना नैगाऊज़ से जुड़ गए. कहते हैं कि जल्दी ही अपनी गलती समझ गए. और “इस नरक में” रहते हुए दस साल से ज़्यादा हो गए हैं. ये सब इतने तनाव से कहा गया था कि उन पर विश्वास न करने का सवाल ही नहीं उठता था.  और मैं भी तो विश्वास करना चाहती थी!           
तीन अप्रैल सन सैंतालीस को रात बारह बजे तक मेरे नन्हे से कमरे में हम कैफ़ियत देते रहे, प्रसन्नता से नैराश्य के बीच गोते लगाते रहे.
जुदा होना बहुत कष्टदायक था: बी.एल. ने कहा कि उन्हें प्यार करने का कोई हक़ नहीं है, कोई भी अच्छी चीज़ अब उनके लिए नहीं बची, उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं और मुझे उन्हें जीवन के परिचित ढर्रे से और – काम से भी, विचलित नहीं करना चाहिए, मगर फिर भी ज़िन्दगी भर वह मेरा ध्यान रखेंगे.
रात भर मैं सो नहीं सकी. एक एक मिनट बाद मैं बालकनी में भागती, सुबह की आहट को सुनती रही, पोतापोव स्ट्रीट के छोटे-छोटे लाईम-ट्रीज़ के नीचे स्ट्रीट-लैम्प्स को बुझते हुए देखती रही...
बाद में इनके बारे में लिखा गया था:
स्ट्रीट लैम्प्स की धुंधली तितलियों ने,
छुआ सुबह को पहली थरथराहट से...
और सुबह छह बजे – घंटी बजी. दरवाज़े के सामने – बी.एल.. पता चला कि वह पैदल-पैदल अपनी समर कॉटेज गए और वापस आए, पूरी रात शहर में घूमते रहे...
हमने ख़ामोशी से एक दूसरे का आलिंगन किया...
वो शुक्रवार का दिन था, चार अप्रैल सन् सैंतालीस. मम्मा अपने पति और मेरे बच्चों के साथ दिन भर के लिए पोक्रोव्स्कोए-स्त्रेश्नेवो घूमने चली गई.
और, जैसे नवविवाहित जोड़े अपनी पहली रात मनाते हैं, उसी तरह हमने ये अपना पहला दिन मनाया. मैंने उनकी सिलवटों वाली पतलून पर इस्त्री की. वे अपनी सफ़लता से बड़े उत्साहित और प्रसन्न थे. वाक़ई में “ऐसी शादियाँ भी होती हैं जो, पति और पत्नी से भी ज़्यादा रहस्यमय होती हैं.”
कितनी साफ़गोई से, और अपनी आत्मा तथा चरित्र की सादगी से बाद में उन्होंने लिखा और कहा था:
 “भावनाओं के अधिकारों और ज़रूरतों  की ही तरह ‘स्वच्छन्द प्रेम’ का विचार  भी मेरे लिए अपरिचित है. ऐसी चीज़ों के बारे में सोचना और बात करना उसके लिए ओछा काम था. अपनी ज़िन्दगी में उसने कभी गुलछर्रे‘ नहीं उड़ाए, अपने आप को कभी अर्ध-ईश्वरों और अतिमानवों की श्रेणी में नहीं रखा, अपने लिए कभी विशेषाधिकारों और सुविधाओं की मांग नहीं की.” (डॉक्टर झिवागो, 1954).
 “मैं नैतिकता के प्रश्नों का निर्णायक नहीं हूँ, और न ही उसके विभिन्न रूपों का विरोधक...  ‘भावनाओं के अधिकारों’ के बारे में, ‘स्वच्छन्द प्रेम’ के बारे में और मनुष्य की निकटता के विभिन्न रूपों के बारे में फ़लसफ़ा बघारने की कल्पना से ही मुझे मतली होने लगती है.” ( 7.5.58 को रेनाटे श्वैत्सर को लिखे पत्र से).                     
 “मैं किसी भी तरह के नियमों के ख़िलाफ़ हूँ – क्या ‘दोमोस्त्रोय’ में वर्णित आधार पर गठित परिवार होना चाहिए, या स्वच्छन्द प्रेम – हर हालत में अलग-अलग संभावनाएँ हो सकती हैं. किन्हीं नियमों की ज़रूरत नहीं है, ज़िन्दगी ख़ुद ही ज़रूरत के मुताबिक फ़ैसला कर लेगी. ..” (2.11.59 को एक महिला को दी गई मुलाक़ात से).
 और, अभी हाल ही में:
 “... जीनियस और सुन्दरी : ये  शब्द कब के एक समान ओछे हो गए हैं. और उनमें समानता क्या है...कुछ परिपूर्ण सा ‘मैं – तुम हो’ उन्हें दुनिया में सभी संभावित संबंधों द्वारा जोड़ता है और गर्व से, उत्साह से, और थकावट से उनकी आकृतियों को एक ही मेडल से जड़ देता है.”
इस ख़ुशनुमा दिन की सुबह बी.एल. ने अपनी कविताओं की लाल पुस्तिका पर लिखा:
 “मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते, ओह, कितना प्यार करता हूँ मैं तुझसे.
                         4 अप्रैल. 1947”
इस लाल पुस्तिका की भी अपना ही किस्सा है. सन् ’49 में, मेरी पहली गिरफ़्तारी के समय मुझसे वे सारी किताबें छीन ली गईं, जो बोर्‍या ने मुझे भेंट दी थीं. और जब पूछताछ ख़त्म हो गई और मुँहासों वाले नौजवान लेफ्टिनेंट की ‘त्रोयका’ ने मुझे सज़ा सुना दी – तो बोर्‍या को लुब्यान्का बुलाकर मेरी किताबें सौंप दी गईं – और उसने वो पन्ना फाड़ दिया.  फिर एक दूसरी सुबह, जब मैं कैम्प से लौट आई थी और हम फिर से सुखी थे, बल्कि पहले से ज़्यादा ख़ुश – मैंने बोर्‍या को ताना दे ही दिया – वो ऐसा कैसे कर सका? अब कवर-पेज के पीछे की ओर उसके हाथ से लिखा था: “मैंने वो लिखावट वाला पन्ना फाड़ दिया, जब उसे घर लाया था. तुम्हें उसकी क्या ज़रूरत है?”
ख़ामोशी से मैंने यह पढ़ा और अपनी ओर से नीचे लिख दिया: “कहने को कुछ बचा ही नहीं है, अच्छा किया: अगर न फ़ाड़ा होता तो ये किताब ख़ुशी के दिनों की यादगार बन जाती – मगर अब है – दुर्भाग्य की, विनाश की! हाँ!”


तब बोर्‍या ने अपनी तस्वीर निकाली, जो वो साथ में लाया था, उसके पीछे 1947 में लिखी इबारत का एक एक अक्षर दुहराया, और उसके नीचे वही तारीख डाली और उसके नीचे लिखा: “ये इबारत अमर है और हमेशा के लिए वैध है. और वह सिर्फ बड़ी ही होती जाएगी.” मगर ये लिखा था सन् 1953 में.

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