गुरुवार, 4 सितंबर 2014

Novyi Mir - 1.5

1.5

“ललचाती है ख़्वाहिश, रिश्तों को तोड़ देने की”

हाँ, चार अप्रैल सन् 47! इसी दिन से शुरू हुई थीं हमारी “शहर में गर्मियाँ”. मेरा और बी.एल. का, दोनों के ही फ्लैट्स ख़ाली थे. हम लगभग हर रोज़ मिलते.
मैं अक्सर सुबह सात बजे छोटे-छोटे घरों वाला और लम्बी पूंछ वाला अपना जापानी गाऊन पहने उसके लिए दरवाज़ा खोलती – “डॉक्टर झिवागो” की एक कविता में यह अमर हो गया है:

घर के लोगों को भेज दिया मैंने बाहर,
कब के बिखर गए परिवार के लोग,
तनहाई से हमेशा की पुरज़ोर,
भर गया है दिल, और प्रकृति की हर चीज़.
......

....उसी तरह फेंकती हो तुम अपनी पोषाक,
क्यारी में जैसे गिरते पत्ते
 गाऊन में रेशमी फुंदने के
जब गिरती हो मेरी बाँहों में.
तुम – मसर्रत हो विनाश के पथ में,
जब जीवन हो बीमारी से भी बदतर,
और सुन्दरता का मूल – साहस,
खींचे हमें एक दूजे की ओर.

उन गर्मियों में लीपा के पेड़ों पर ग़ज़ब की बहार आई थी, वृक्ष-वीथियाँ शहद की सुगन्ध से महक रही थीं.  उषःकाल की विस्मयकारी अधूरी नींद, हमारे प्यार के उन दिनों में – और जन्म लिया चिस्तीये प्रूदी के लीपा वृक्षों की चिर अनिद्रा के बारे में कविता ने. बी.एल. मेरे छोटे से कमरे में सुबह छह बजे आते...उनकी नींद, बेशक पूरी नहीं हुई होती – और इसका मतलब था कि न तो वृक्षवीथी की, न घरों की, और ना ही स्ट्रीट-लैम्प्स की नींद पूरी हुई थी.

एक बार मैंने अपने बालों को मम्मा की कछुए की शल्क वाली कंघी से संवार कर सिर के ऊपर बांध लिया था, और आईने में देखती हुई “हेल्मेट वाली औरत” का जन्म हुआ...” मुझे चोटियों वाले इस सिर से बेहद प्यार है!”

अब - हम, वैसे, पहले जैसे, कब के नहीं रहे; मगर मम्मा की कंघी – उस समय के मेरे घने बालों में, और ठीक से सो न सके लीपा के वृक्ष, कविता में समा गए और हमसे – मुझसे, बी.एल. से, पोतापोव स्ट्रीट वाले छोटे से कमरे से – पृथक, अपने स्वतंत्र अस्तित्व में हैं.

हमारे उन “विद्युन्मय” दिनों में शोकपूर्ण स्वरों के बावजूद काफ़ी कुछ मज़ेदार भी था.

एक बार, बिल्कुल आरंभिक दिनों में, ठण्डे रास्तों पर काफ़ी घूमने के बाद, मेरे छोटे-से कमरे की गर्माहट में बैठे हुए (शायद हमारे परिवार में वह दूसरी बार आए थे), बी.एल. कुर्सी से उठकर मेरी ओर दीवान की तरफ़ लपके. दीवान इतना पुराना था कि फ़ौरन टूट गया – उसकी टांग टूट गई. बोरिस लिओनीदोविच फ़ौरन उछले, “ये दुर्भाग्य है! क़िस्मत ख़ुद,” उन्होंने उत्तेजित स्वर में कहा, “मेरे अवांछनीय बर्ताव की ओर इशारा कर रही है!”

दूसरी बार, काफ़ी समय के पश्चात्, जब हम अक्सर कैफ़ियत देते और झगड़ते थे, एक और किस्सा हुआ, जिसे याद करके मैं आज भी मुस्कुराने लगती हूँ. बोरिस लिओनीदोविच को पिछली शाम को मेरे द्वारा किए गए ‘नाटक’ का बदला लेना था. मगर मैं समझौता करना चाहती थी, मैंने फूलदानों में कई सारे गहरे नीले रंग के फूल सजा दिए.
 “ये नीले रंग के हैं,” बी.एल. ने गुस्से से कहा, “और वैसे भी – घास-पात है.”
बाद में पता चला कि उन्हें कमरे में फूल पसन्द नहीं हैं, हालाँकि अपनी परिचित महिलाओं को ख़ुद भी फूल ही भेजा करते थे.

बी.एल. को पारिवारिक झगड़े पसन्द नहीं थे. ज़ाहिर है कि मुझसे मुलाक़ात से पहले वह ऐसे कई प्रसंगों से गुज़र चुके थे. इसलिए जब मैं कोई गंभीर बात की शुरूआत करती, वो पहले ही सतर्क हो जाते. मेरे जायज़ तानों के जवाब में अपनी गहरी आवाज़ में भुनभुनाने लगते.
 “नहीं, नहीं, ओल्यूशा! हम दोनों ऐसे तो नहीं हैं!
  ये किसी बुरे उपन्यास का दृश्य है.
  ये तुम हो ही नहीं सकतीं!”
और मैं ज़िद्दीपन से अपनी बात पे ज़ोर देती, “नहीं, ये मैं ही हूँ, बिल्कुल मैं ही! मैं एक ज़िन्दा औरत हूँ, मैं कोई तुम्हारी कल्पना नहीं हूँ!”
हम अपनी-अपनी बात पर अड़े रहते.
रिश्तेदारों की किचकिच ने कितने सारे ख़ूबसूरत लमहों को बरबाद कर दिया. मेरे कानों में लगातार भिनभिनाते कि बी.एल. को अपनी ज़िन्दगी बदलनी चाहिए, अगर वह मुझसे प्यार करता है तो अपने परिवार को छोड़ दे वगैरह, वगैरह.

मम्मा के बारे में कोई भी बुरी बात नहीं कहना चाहती, मगर उसका क़ुसूर भी कम नहीं था. कभी वो बी.एल. के साथ बेवकूफ़ी भरे नाटक करती, जैसे कि उन्हें फोन कर दिया और कहा कि उनके कारण मैं बीमार हो गई हूँ, जबकि मुझे सिर्फ फ्लू हुआ था; कभी, जब वो दो-तीन दिन आ नहीं पाते थे, तो उनकी कठोर-हृदयता से तैश में आ जाती.
 “आपकी बेटी से मैं अपनी ज़िन्दगी से भी ज़्यादा प्यार करता हूँ, मारिया निकोलायेव्ना,” - बी.एल. ने मम्मा से कहा, - “मगर इस बात की उम्मीद न रखिए कि बाहरी तौर पर हमारी ज़िन्दगी अचानक बदल जाएगी.
बेशक, मम्मा मातृत्व की भावना से ही काम कर रही थी; अपनी समझ के अनुसार, वह मेरे लिए स्थायी सुख चाहती थी. उसे ऐसा लगता कि वह पति के रूप में मेरे पास आये, चाहे फिर चला जाये, और दो-तीन दिनों तक न भी आए तो कोई बात नहीं है: उसे, बेशक, हमें फ़ौरन आशीर्वाद देने की ख़्वाहिश थी, मगर हमारा किस्सा भी चेखव के लाझेच्निकोव वाली तस्वीर जैसा ही चलता रहा.

मैं बोर्‍या को पति से बढ़कर मानती थी. उसने मेरी ज़िन्दगी के सभी पहलुओं पर अधिकार कर लिया था, एक भी कोना ऐसा नहीं छूटा था, जहाँ उसका दख़ल न हो. मेरे बच्चों के साथ, ख़ासकर बड़ी हो रही ईरीन्का के साथ, उसका प्यार भरा, नज़ाकतभरा व्यवहार मुझे बड़ी ख़ुशी देता था.
हमारी इस शोकांतिका के आरम्भिक दिनों में, ईरीना के बी.एल. के प्रति व्यवहार पर मम्मा का काफ़ी प्रभाव था. शुरू में, जब वह मुझे उसकी तस्वीरें कभी उतारते, कभी लगाते देखती, तो अपने होंठ भींचकर नफ़रत से कहती: “आत्मसम्मान तुममें है ही नहीं, मम्मा!...”
मगर जैसे जैसे वह बड़ी होती गई, सब बदल गया. “मैं तुम्हें समझ सकती हूँ, मम्मा” – आख़िर में उसने मुझे बी.एल. की तस्वीर वापस लगाते हुए देखकर कहा.
किसी बड़े आदमी ने बच्चों से कह दिया, “बच्चों, तुम ध्यान रखना, हमारे ‘क्लासिक’ के साथ गुज़ारा हुआ हर पल तुम्हारे लिए बहुमूल्य होना चाहिए!” और इस औपचारिक और आदरसूचक शब्द “क्लासिक” से ईरीना के होठों से अचानक निकला प्यार भरा शब्द “क्लास्यूशा”...
”क्लास्यूशा” उसके लिए दुनिया में सबसे निकटतम व्यक्ति बन गया, अत्यंत संवेदनशीलता से वह उसकी प्यारी-प्यारी कमज़ोरियों को, उसके बड़प्पन को, उसकी दरियादिली को महसूस करती थी.
मगर तब बात बच्चों की नहीं थी.                           

मैं भी अक्सर समझदारी से काम नहीं लेती, और कई ख़ूबसूरत पलों को बरबाद कर देती. रिश्तेदारों के ताने मुझ पर असर दिखाए बिना न रहते, और मैं उस पर अपने अधिकार जता बैठती. उन बेवकूफ़ी भरे तमाशों को याद करके तकलीफ़ होती है और शर्म आती है. रास्तों पर जी भर के घूमने के बाद, ग़ैरों के प्रवेश द्वारों पे कभी लड़ते, तो कभी सुलह करते हुए, बोर्‍या ने इस बारे में लिखा:
....मैं फिर से बनाता हूँ बहाने,
और फिर सब लगता है बेमानी मुझे.
जाती है पड़ोसन, पिछवाड़े का चक्कर लगाके,
देती है हमें पल तनहाई के.
      
* * *
न रो, न सिकोड़ सूजे हुए होठों को,
न भींच उन्हें बेदर्दी से.
सताएँगी सूखी दरारें उनको
बसंत में बुखार के बाद थीं जैसे.
मेरे सीने से हटा ले अपना हाथ,
हम तो तार हैं विद्युत-प्रवाह के.
देखना, फिर से कुछ न कुछ,
फेंकेगा एक-दूजे की ओर हमें.
*******

मगर रात जकड़ ले चाहे,
कितने भी दर्दनाक फंदे में मुझे,
शिद्दत से चाहता है दिल वापस लौट आने को,
और ललचाती है ख़्वाहिश रिश्तों को तोड़ देने की.

  “नहीं, नहीं, सब ख़त्म हो गया, ओल्यूशा,” – तलाक की और एक कोशिश के बाद बी.एल. ने ज़ोर देकर कहा, “बेशक, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मगर मुझे जाना होगा, क्योंकि परिवार से तलाक की भयंकरता को बर्दाश्त करने की ताक़त मुझमें नहीं है – (ज़िनाईदा निकोलायेव्ना को अब तक मेरे बारे में पता चल गया था, और वह बी.एल. के सामने तमाशे करने लगी थी) – अगर तुम इस बात से समझौता नहीं करना चाहतीं कि हमें एक ऊँची दुनिया में रहना होगा और किसी अज्ञात शक्ति का इंतज़ार करना होगा जो हमें मिला सकेगी, तो बेहतर है कि हम अलग हो जाएँ. किसी और की बरबादी के भग्नावशेषों पर मिलना ठीक नहीं है.
मगर हम, बार-बार, “विद्युत-प्रवाहित तार” थे – अलग होना हमारे बस में ही नहीं था.
एक बार बी.एल. का छोटा बेटा लेन्या बेहद बीमार हो गया. और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने बीमार बेटे के बिस्तर के पास बी.एल. से वचन ले लिया कि वह मुझसे कभी नहीं मिलेंगे. तब उन्होंने ल्यूस्या पोपोवा से विनती की कि वह मुझे इस निर्णय की सूचना दे दे. मगर उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि ये उन्हें ख़ुद ही करना चाहिए.
मुझे याद है कि मैं ल्यूस्या के फूर्मानोव स्ट्रीट वाले घर में बीमार पड़ी थी. अचानक वहाँ आंधी की तरह ज़िनाईदा निकोलायेव्ना घुसी. उसे और ल्यूस्या को मुझे अस्पताल पहुँचाना पड़ा, क्योंकि रक्तस्त्राव के कारण मेरी हालत बहुत ख़राब हो गई थी. और अब मुझे याद नहीं है कि इस हट्टी-कट्टी, कड़े स्वभाव की औरत से हमने क्या बातें कीं, जो लगातार यह दुहरा रही थी कि वह मेरे प्यार पर थूकती है, वह बी.एल. से प्यार नहीं करती, मगर इस बात की भी इजाज़त नहीं देगी कि उसका परिवार नष्ट हो जाए.
अस्पताल से मेरे वापस लौटने के बाद बोर्‍या इस तरह आया जैसे कुछ हुआ ही न हो और बड़े मर्मस्पर्शी तरीके से मम्मा के साथ समझौता कर लिया, उसे यह समझाते हुए कि वो मुझसे कितना प्यार करता है. मम्मा को उसके इन तरीकों की आदत हो चुकी थी.

और एक और कोशिश रिश्तों को तोड़ने की. सन् 1953 चल रहा था. कैम्प से मेरी वापसी नज़दीक आ रही थी. कितना दुखी था वह मेरे लिए, मेरी रिहाई के लिए उसने कितनी कोशिशें की थीं, ये उन  हृदयस्पर्शी पोस्टकार्ड्स से भी ज़ाहिर होता है जो उसने मम्मा के नाम से पोत्मा-कैम्प में मुझे लिखे थे. मैं उन पोस्ट-कार्ड्स को अपने साथ वापस ला सकी थी.

ये कह सकते हैं कि उनके दिल के पहले दौरे की वजह हमारी जुदाई ही थी; उनकी उस समय की बेहतरीन कविताएँ इस जुदाई के विषय पर ही लिखी गई थीं:
देखता है इन्सान देहलीज़ से,
नहीं पहचानता घर को...

हमारी मुलाक़ात उसे सपने में एक चमत्कार की तरह प्रतीत हुई:
ढाँकती है बर्फ़ रास्ते को,
दफ़न करती ढलवाँ छतों को.
जाता हूँ, टांगें सीधी करने, -
खड़ी हो तुम दरवाज़े के पीछे...

और, जब भाग्य हमें सचमुच में मिलाने वाला था, तो उसे ऐसा लगा कि मैं अब वो नहीं रही, और वह भी वो नहीं है, और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने उसे दिल के दौरे से बचाया है, और उसके प्रति समर्पण और धन्यवाद की भावना के ऐवज में व्यक्तिगत ज़िन्दगी का त्याग करना चाहिए. और बी.एल. ने   पन्द्रह साल की ईरा को चिस्तोप्रूद्नी-मार्ग पर बुलाया और उसे एक अजीब सा काम सौंपा. बच्ची को अपना माँ से, जो क़रीब चार साल की कैद के बाद कैम्प से वापस लौट रही थी, ये संदेश देना था: वह मुझसे प्यार करता है, सब कुछ ठीक था, मगर अब हमारे रिश्तों में कुछ परिवर्तन आ सकता है.

अफ़सोस की बात है कि उस समय ईरा कोई नोट्स-वोट्स नहीं लेती थी. इसलिए उनके शब्दों की असली लज़्ज़त - एक मासूम आकर्षण और साथ ही एक निर्विवाद कठोरता का मिश्रण – सुरक्षित नहीं रह पाई.
अपने निकटतम व्यक्ति में परिवर्तन के उसके भय को मैं जानती थी.  अपनी बहन लीदिया से मिलने से वह पूरी शिद्दत से बचते रहे, जिसकी याद एक जवान, ख़ूबसूरत लड़की के रूप में उनके दिमाग़ में बसी थी. “कितना भयानक लगेगा,” उसने मुझसे कहा था, “जब हमारे सामने एक भयंकर बूढ़ी, और हमारे लिए नितांत अपरिचित औरत प्रकट होगी.”
मुझे यक़ीन है कि उसे ये डर था कि कैम्प के बाद मैं भी वैसी ही बूढ़ी नज़र आऊँगी. इसीलिए ईरा को ये नाज़ुक ज़िम्मेदारी उसने दी थी – कि हो सकता है कि ज़िन्दगी पहले जैसी न रह पाए.
और अचानक उसने देखा कि मैं तो वैसी ही हूँ. हो सकता है, कुछ और दुबली हो गई थी. बी.एल. के प्रति मेरा प्यार और मेरी उससे निकटता मुझमें नवजीवन का संचार कर देते थे.
मतलब, जुदाई से तितर-बितर हो गई हमारी ज़िन्दगी अचानक उसके लिए एक अप्रत्याशित उपहार लेकर आई – और “गर्म हाथों के आलिंगनों का जादू” और दुनिया के उत्सव में दो दिलों की विजय से बढ़कर और कुछ भी नहीं था.
हमें जैसे किसी जुनून भरी नज़ाकत और हमेशा साथ रहने के निश्चय ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. और राजमार्ग वाले अपने उस काम के बारे में ईरा ने मुझे बी.एल. की मृत्यु के कई सालों बाद बताया...
हाँ, थी चाहत रिश्तों को तोड़ने की - उसके, कवि के भीतर - मगर एक दूसरे के प्रति हमारे मानवीय आकर्षण की हमेशा जीत हुई, मानो हम एक दूसरे के बगैर साँस भी नहीं ले सकते थे. हर मुलाक़ात – पहली मुलाक़ात थी, - उसका सिर ख़ामोशी से अपने सीने से चिपटाती. सुनती, दिल कैसी बदहवासी से धड़क रहा है. और सन् 1960 के मई के उस आख़िरी, दुर्भाग्यशाली दिन तक ये ऐसा ही रहा. मेरे अंतर्मन में वह बूढ़ा हो जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता था.
मुझे याद है कि स्टालिन की मृत्यु के बाद, जब मैं यातना-कैम्प से वापस आई, तो बी.एल. ने अपनी प्रतीकात्मक परीकथा लिखी, जो मेरी ‘क़ैद’ और आज़ादी को समर्पित थी. अगर उसमें उसने मुझे एक परी के रूप में चित्रित किया था, जिसे ड्रैगन ने पकड़ लिया था, तो शायद, स्वयँ को वह रक्षक समझ रहा था जो जंगल, नदियाँ, सदियाँ पार करके परी को बचाता है, और निःसंदेह यह यक़ीन करना चाहता था कि उसके नाम ने ही मुझे क़ैद से छुड़ाया है. “हालाँकि, मैंने तुम्हें अनचाहे ही इस सब में खींचा था, ल्याल्यूशा, मगर तुम भी तो कहती हो कि ‘वे’ मुझे तोड़ने की हिम्मत न कर सके. उनके हिसाब से, पाँच साल क्या होते हैं, अगर ‘वे’ दशकों में ही गिनते हैं! और उन्होंने मुझे सज़ा दी – तुम्हें क़ैद करके, मगर ख़ुदा ने सब ठीक कर दिया!”
इन अद्भुत क्षणों में बी.एल. ने जो कुछ भी मुझसे कहा वह सब मैं वैसा का वैसा दुहरा नहीं सकती. वह ‘दुनिया को उलट-पलट’ कर देने को तैयार था, ‘दोनों तरह की दुनिया को चूमना चाहता था.”

यह महसूस करके मुझे ख़ुशी होती थी कि वो मेरे बारे में परिवार के एक अंश की तरह विचार करता है, और मैं महसूस कर रही थी कि कैसे मेरे और मेरे अपनों की आर्थिक ज़िम्मेदारी उसे प्रेरित कर रही है, ऊपर उठा रही है. मुझसे बिदा लेते हुए अक्सर वह दुहराता – ओल्यूशा, मैं तुम्हारे पास से सिर्फ काम करने के लिए ही जाता हूँ. और अगर दिन में अच्छा सृजनात्मक काम हो जाता तो मेरे कमरे में इस तरह वापस लौटता, जैसे कोई त्यौहार मनाने आया हो – और हम दोनों ख़ुश होते, और, ऐसा लगता कि ज़िन्दगी में कोई मुश्किलें हैं ही नहीं...
मगर साथ ही ये भी याद दिलाते कि हमें जल्दी नहीं मचाना चाहिए, सब कुछ अपने आप हो जाएगा, जैसे कि ‘नोवी मीर’ वाली मुलाक़ात हुई थी.
 “तुम मेरे लिए बसंत का उपहार हो, मेरी आत्मा, ख़ुदा ने कितना अच्छा किया जो तुम्हें बच्ची बनाया...”
 “ओल्यूशेन्का, यह सब ज़िन्दगी भर ऐसा ही रहने दो – हम एक दूसरे की ओर उड़े चले आते हैं, और हमारे इस मिलन के अलावा कोई और चीज़ ज़रूरी नहीं है...! हमें किसी और चीज़ की ज़रूरत भी नहीं है – आगाह करने की, उलझनें पैदा करने की, किसी का अपमान करने की कोई ज़रूरत नहीं है...क्या तुम इस औरत की जगह पर होना पसन्द करोगी?  कई सालों से हम एक दूसरे की बात भी नहीं सुन रहे हैं...और बेशक, उस पर सिर्फ दया की जा सकती है – वह पूरी ज़िन्दगी बहरी ही रही – बेकार ही कबूतर उसकी खिड़की पे चोंच मारता रहा...और अब वह इस बात पर क्रोधित है, कि मुझे सच्चा प्यार मिल गया है – मगर कितनी देर से!”
इन पलों में हमारे सारे झगड़े लुप्त हो जाते. अफ़सोस, कि मेरी स्त्री-सुलभ शिकायतें कभी-कभी वापस लौट आतीं.


उस समय, जब मैं अपने आप को भाग्यवान महसूस कर रही थी, मेरे आस पास रहने वाले मुझ पर तरस खाते, मेरी निंदा करते, और ये सब बड़ा निराशाजनक था...शायद मुझे उम्मीद थी जलन की, मान्यता की. मम्मा ने आख़िरकार मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया.

रविवार, 24 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.4


1.4
“मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते...”

सन् 1947 आ पहुँचा. चार जनवरी को मुझे चिट्ठी मिली:
 “एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएँ. दूर से ही मुझे शुभकामनाएँ दीजिए (कल्पना में) कि मैं जल्दी से “हैम्लेट”  और “1905” को दुहरा सकूँ और उसमें सुधार करने के बाद फिर से अपना काम शुरू कर सकूँ.
आप बेहद ख़ूबसूरत हैं, और मेरी ख़्वाहिश है कि आप ख़ुश रहें.
बी.एल.”
बोरिस पास्तरनाक की पहली चिट्ठी – रेखाओं पर उड़ते हुए सारस – वे पहली बार उड़कर मेरे पास आए थे...मगर उनके पंखों में कुछ ठण्डापन था: मेरे अंतर्मन से मैं कुछ और की भी अपेक्षा कर रही थी, कुछ ज़्यादा गर्मजोशी से भरे शब्दों की, संदेह में डाल रहा था : “काम शुरू कर सकूँ...” जैसे मुझे दूर ठेला जा  रहा हो, मुझ पर प्रतिबन्ध?...     
नए साल की मेज़ पर मेरे साथ थे बच्चे, मम्मा, दिमित्री इवानोविच...और यह चिट्ठी.
इस बीच संपादक दफ़्तर में कुछ मुश्किलें शुरू हो गईं. हाल ही में कंसंट्रेशन कैम्प से लौटे ज़ाबोलोत्स्की की कविताओं की पैरवी मैंने इतनी ज़्यादा हिम्मत से की, जितनी मुझसे उम्मीद नहीं थी. इसके अलावा, पत्रिका के लिए सीमोनोव द्वारा सोचे गए नए स्तम्भ, ‘साहित्यिक पल’ के न बन पाने के कारण उसके सहायक – क्रीवित्स्की के साथ कई बार मेरी झड़प भी हो गई थी. इस स्तम्भ के अंतर्गत समकालीन कवियों को ‘उसी पल’ लिखी गई कविताएँ देनी होती थीं.
मुझे याद है कि बी.एल. अपनी कविता “शीत ऋतु की शाम” लाए थे (श्वेत रंग है वसुंधरा पर...). यह कविता जब हम मारिया विन्यामिनोव्ना यूदिना के घर गए थे, उसके बाद लिखी गई थी. मुझे याद है कि मुझे और लीदिया कोर्नेयेव्स्काया चुकोव्स्काया (वह ‘नोवी मीर’ में साहित्यिक सलाहकार थी) को बहुत गुस्सा आया था: सीमोनोव ने पास्तरनाक को छापने का वादा किया था, मगर नहीं छापा, और, संपादक के कैबिन में घबराहट से घूमते हुए, ये यक़ीन दिला रहा था कि “शीत ऋतु की शाम” के लिए अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल दे देता. मगर फिर भी उसने यह कविता नहीं छापी, और वो स्तम्भ भी बिखर गया. मगर “शीत ऋतु की” वो शमा, कई-कई बार, सीमोनोव की उस समय की कविताओं में जलती रही.
संपादकीय दफ्तर में उत्पन्न कठिनाईयों के बारे में मुझे बी. एल. को बताना पड़ा. वहाँ लोग समझ गए थे कि बी.एल. के साथ मेरा रिश्ता उस हद को पार कर चुका है जो संपादकीय दफ्तर के कर्मचारी और वहाँ आने वाले लेखक के बीच होता है. क्रीवित्स्की ज़हरीली मुस्कान से फ़ब्तियाँ कसता: “मुझे हैरानी होती है, कि पास्तरनाक के साथ आपकी नज़दीकियों का क्या हश्र होगा?” इसके अलावा, वो ख़ुद भी मेरे नज़दीक आने की कोशिश कर रहा था, संपादकीय दफ़्तर की अन्य महिलाओं के साथ भी वह इसी तरह पेश आता था.
जब मैंने परेशान होकर, और, हो सकता है, कुछ बढ़ाचढ़ाकर अपनी मुसीबतों के बारे में बी.एल. को बताया, तो उन्होंने उत्तेजित होकर कहा: “आपको फ़ौरन वहाँ से हट जाना चाहिए, आपकी देखभाल की ज़िम्मेदारी मैं उठाऊँगा.”
अगले दिन उन्होंने संपादकीय दफ़्तर में फोन किया और कुछ दयनीय स्वर में कहा: “मुझे तुरंत दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में आपसे कहना है. क्या आप फ़ौरन पूश्किन (पूश्किन का स्मारक – अनु.) के पास आ सकती हैं?”
जब मैं स्मारक के पास पहुँची, जहाँ हम अक्सर मिला करते थे, तो उत्तेजित बी.एल. घूम रहे थे.
और अचानक – अजीब सी, असाधारण आवाज़ में बोले:
 “अभी मेरी ओर न देखिए. मैं संक्षेप में आपसे अपनी प्रार्थना कहूँगा: मैं चाहता हूँ कि आप मुझे “तुम” कहें; क्योंकि “आप” अब झूठ हो गया है.”
 “मैं आपको “तुम” नहीं कह पाऊँगी, बोरिस लिओनीदोविच,” मैंने विनती की, “ये मेरे लिए असंभव है, अभी डर लगता है...”
 “नहीं, नहीं, नहीं, आपको आदत हो जाएगी, ठीक है अभी आप मुझे ‘तुम’ न कहिए, चलिए, मैं आपको “तुम” कहूँगा...”
मैं, बेहद परेशान, संपादकीय दफ़्तर में लौटी...महसूस कर रही थी कि कुछ और, बेहद महत्त्वपूर्ण, होने वाला है आज...बिल्कुल आज ही!”
शाम के क़रीब नौ बजे पोतापोव्स्की वाले मेरे घर में गरम पानी वाली बैटरी में जानी-पहचानी टक्-टक् हुई...
 “दूसरी बात तो मैंने तुमसे कही ही नहीं, तुम्हें दूसरी बात बताई ही नहीं,” – उत्तेजित, फुसफुसाती आवाज़ में बी.एल. ने कहा – “और तुमने भी यह जानने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि मैं क्या कहना चाह रहा था. मुझे कहना होगा. तो, पहली बात ये थी कि हमें “तुम’ पर उतरना होगा, और दूसरी, मैं तुमसे प्या-र- करता हूँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मेरे लिए अब यही ज़िन्दगी है. कल मैं संपादकीय दफ़्तर में नहीं आऊँगा, बल्कि तुम्हारे कम्पाऊण्ड की तरफ आऊँगा, तुम उतर कर मेरे पास आना और हम मॉस्को में भटकेंगे.”
मैं घर लौटी और अपनी समूची पीड़ा से, पूरी ईमानदारी से और अपने प्रति निर्ममता से बी.एल. को पत्र लिखा. ये ख़त नहीं, बल्कि स्वीकारोक्ति थी – एक पूरी स्कूली-नोटबुक.
मैंने लिखा कि मेरे पहले पति एमेल्यानोव ने मेरे कारण फाँसी लगा ली; मैंने उसके प्रतिस्पर्धी और दुश्मन विनोग्रादोव से शादी कर ली; विनोग्रादोव के बारे में कई अफ़वाहें फैली थीं. वो काफ़ी सम्मोहक किस्म का और उदार इन्सान था, मगर कुछ लोग ऐसे थे जो इस बात का दावा करते थे कि उसीने मेरी माँ के ख़िलाफ़ शिकायत लिखी थी कि उसने अपने फ्लैट में “लीडर की निंदा” की थी, और मेरी बेचारी मम्मा को तीन साल कैम्प में गुज़ारने पड़े, युद्ध के सबसे भयानक और भुखमरी के सालों में. मगर मैं उसके साथ ही रही (हमारा एक बेटा था, और ईरा से भी वह पिता की ही तरह बर्ताव करता था) और सिर्फ उसकी मौत ने ही इस भयावहता का अंत किया. (सिर्फ उसकी मृत्यु के बाद ही मैं अपनी मम्मा को ढूंढ़ने निकल सकी, बिना टिकट के, फ़ौजी के ग्रेट-कोट में, उस भयानक स्टेशन ‘सूखो-बेज़वोद्नोए’ (सूखा-निर्जल-अनु.) पहुँची, ब्लड-डोनर के रूप में मुझे मिलने वाला स्पेशल राशन उसके लिए ले गई, और उसे वहाँ से निकालने में भी कामयाब हो गई. अपंग और बीमार लोगों को वहाँ से निकालने के कानून का इंतज़ार किया, उन दिनों ये संभव था, और ग़ैरकानूनी तरीक़े से अधमरी मम्मा को मॉस्को ले आई. ज़िन्दगी में काफ़ी कुछ भयानक था. मौतें, आत्महत्याएँ...)”
 “अगर आप,” (मैंने फिर भी ‘आप’ ही लिखा था), आँसुओं की वजह बने थे, तो मैं भी बनी थी! अब आप ही फैसला कीजिए कि आपके “तुमसे प्यार करता हूँ” का, मेरी ज़िन्दगी के इस सबसे बड़े सुख का, क्या जवाब दूँ...”  
अगले दिन मैं नीचे उतरी; बी.एल. हमारे कम्पाऊण्ड के सूखे फ़व्वारे के पास मेरा इंतज़ार कर रहे थे. यहाँ एक मज़ेदार बात हुई. उत्सुकतावश मेरी मम्मा सीढ़ियों वाली खिड़की के पास आई और इतना झुककर देखने लगी कि जब मैं उतरकर बी.एल. के पास आई तो वो बड़े आश्चर्यचकित और उत्तेजित लग रहे थे: “कोई औरत खिड़की से बस गिरते-गिरते बची.”
हमारी मुलाक़ात बहुत संक्षिप्त रही: बी.एल. मेरी नोट-बुक पढ़ने का इंतज़ार न कर सके.
रात साढ़े ग्यारह बजे टक्-टक् की आवाज़ सुनकर मैं फिर से नीचे वाले फ्लैट में उतरी. ओल्गा निकोलायेव्ना के कटु शब्दों ने मेरा स्वागत किया, “ल्युसेन्का, मैंने, बेशक, आपको बुला तो लिया, मगर वाक़ई में बहुत रात हो चुकी है और मिख़ाईल व्लादिमीरोविच सो चुके हैं.”
मुझे बेहद अटपटा लग रहा था, मगर मैं बी.एल. से यह कहने का फ़ैसला न कर सकी कि इतनी रात को फ़ोन न किया करें. उनकी आवाज़ ने मुझे इस सबके ऐवज़ में तोहफ़ा दे दिया, “ ओल्युशा, मैं तुमसे प्यार करता हूँ; आजकल शाम को मैं अकेले रहने की कोशिश करता हूँ और अपनी कल्पना में देखता हूँ कि तुम कैसे संपादकीय दफ़्तर में बैठी हो, न जाने क्यों वहाँ चूहे भाग रहे हैं, कैसे तुम अपने बच्चों के बारे में सोच रही हो. तुम लड़खड़ाते हुए मेरी किस्मत में आई हो. ये नोट-बुक हमेशा मेरे पास रहेगी, मगर तुम्हें मेरे लिए इसकी हिफ़ाज़त करनी होगी, क्योंकि मैं इसे घर में नहीं रख सकता, उसे ढूंढ़ सकते हैं.”
और मैंने वह स्वीकारोक्ति वाली नोट-बुक हिफ़ाज़त से रख दी. दो साल बाद वह एम.जी.बी.(मॉस्को सुरक्षा ब्यूरो) के पूछताछकर्ता के हाथ लग गई.
इस तरह मैंने और बी.एल. ने वो सीमा पार कर ली जिसके बाद हमें हर चीज़ अधूरी लगती, और बस एक ही बात बची थी: एक हो जाना. मगर इस रास्ते पर रुकावटें थीं, लगता था कि वे दूर ही नहीं होंगी.
ये समय था मॉस्को की अंधेरी गलियों और सड़कों पर अंतहीन क़ैफ़ियतों का, भटकनों का. कई बार हम एक दूसरे से जुदा हुए फिर कभी न मिलने के लिए, मगर मिले बिना रह न सके.
मैं रहती थी मम्मा के साथ, उसके पति द्मित्री इवानोविच कोस्त्को के साथ और अपने दो बच्चों के साथ, जिनके पिता अलग अलग थे. दोनों ही कब के गुज़र चुके थे. युद्ध के कारण मेरे बच्चे वास्तविक बचपन से महरूम रह जाते, अगर द्मित्री इवानोविच पिता की तरह उनकी देखभाल न करते. मगर फिर भी बच्चों को अपने अनाथ होने का एहसास था, ख़ासकर बड़ी ईरीना को.
आख़िर वो दिन आया जब बोरिस पास्तरनाक पहली बार मेरे बच्चों के सामने आए. मुझे याद है कि कैसे अपना पतला हाथ मेज़ पर टिकाकर ईरोच्का ने उन्हें कविता सुनाई थी. पता नहीं ये मुश्किल कविता उसने कब याद की थी.
व्यस्त हो तुम अपनी बैलेन्स-शीट में,
सु.कौ.पी.ए.* की शोकांतिका में,
तुम, ओ गायक, फ्लायिंग डचमैन से,
मनचाही कविता के सोपान पे.
तंबुओं का गंदला तूफ़ान,
उमड़ उठा उफ़नती द्वीना की तरह,
जब तुम, ओ, पंखधारी
प्रकट हुए मेरे साथ-साथ.
और तुम, पेट्रोल का बिल लिए?
परेशान और बदहवास मैं,
सोचता हूँ डॉक्टर के बारे में,
लौटा दे जो तुम्हें वापस तुम्हारा आवेश.
मालूम है मुझे, तुम्हारी राह है अनूठी,
मगर कैसे आओगे तुम,
इन पंगुओं के दड़बे से,
इस सच्ची राह पर?
* सु.कौ.पी.ए. (सुप्रीम कौंसिल ऑफ पीपल्स एकोनोमी. जन-अर्थव्यवस्था की उच्चतम कौंसिल.)  
बी.एल. ने एक आँसू पोंछा और ईरिन्का को चूम लिया.  “कैसी गज़ब की हैं इसकी आँखें! ईरोच्का, मेरी तरफ देखो! बिल्कुल ऐसे ही तुम, सीधे मेरे उपन्यास में आ गई हो!”
डॉक्टर झिवागो में लारा की बेटी कातेन्का का वर्णन – ये मेरी ही बेटी का वर्णन है:
 “कमरे में क़रीब आठ साल की लड़की आई दो पतली-पतली चोटियों वाली. पतली-पतली, कोनों तक जाती आँखों में चालाकी का भाव प्रतीत होता था. जब वह हँसती तो उन्हें कुछ ऊपर उठा लेती.”
मगर अपने परिवार के प्रति दया और दुहरी ज़िन्दगी का बोझ बोरिस लिओनीदोविच का दम घोंटने लगते – क्या किया जाए. वो बार बार मुझसे कहते कि अपने फ्लैट में प्रवेश करते हुए, जहाँ बुढ़ाती बीबी उसका इंतज़ार कर रही होती, वो अचानक उसमें रेड राईडिंग हुड को देखने लगते, जो जंगल में रास्ता भूल गई थी, और तलाक़ के लिए सोचे गए शब्द गले में ही अटक कर रह जाते. मगर वो मुझे यक़ीन दिलाते कि पत्नी के प्रति उदासीनता के लिए, बल्कि उसके कठोर चरित्र और खनखनाती आवाज़ से डर के लिए, मैं ज़रा भी दोषी नहीं हूँ. “वह पुलिस-कर्नल के परिवार से है”, गहरी साँस लेते हुए बी.एल. ने कहा. ये सब तो मुझसे मुलाक़ात होने के काफ़ी पहले से ही शुरू हो गया था. ये सब बड़ा अटपटा लगता है.  “ये किस्मत का ही खेल था,” उन्होंने कहा, “ज़िनाईदा निकोलायेव्ना से संबंध के पहले ही साल में मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया – असल में मैं उसे नहीं बल्कि गारिक को पसन्द करता था, (उसके पहले पति – गेन्रिख गुस्तावोविच नैगाऊज़ – का ज़िक्र उन्होंने इसी नाम से किया था) – जिसके पियानो वादन ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. “
 “और जब ज़ीना उसे छोड़कर मेरे पास चली आई तो वह, सनकी आदमी, मुझे जान से मारने चला था! मगर बाद में उसने इसके लिए मुझे बहुत धन्यवाद दिया!”
ये थे – वास्तविक बी.एल. हो सकता है - वो पियानो-वादन से सम्मोहित हो गए, और उस स्वर्गीय सुख की अनुभूति के पल में उन्हें महसूस हुआ हो कि ऐसी स्थिति सिर्फ किसी औरत के लिए गहरे प्यार के कारण उत्पन्न हुई है.
और, दो परिवार टूट गए, बड़ी मुश्किल से वो अपनी पहली पत्नी येव्गेनिया व्लादीमिरोव्ना और नन्हे बेटे से अलग हुए और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना नैगाऊज़ से जुड़ गए. कहते हैं कि जल्दी ही अपनी गलती समझ गए. और “इस नरक में” रहते हुए दस साल से ज़्यादा हो गए हैं. ये सब इतने तनाव से कहा गया था कि उन पर विश्वास न करने का सवाल ही नहीं उठता था.  और मैं भी तो विश्वास करना चाहती थी!           
तीन अप्रैल सन सैंतालीस को रात बारह बजे तक मेरे नन्हे से कमरे में हम कैफ़ियत देते रहे, प्रसन्नता से नैराश्य के बीच गोते लगाते रहे.
जुदा होना बहुत कष्टदायक था: बी.एल. ने कहा कि उन्हें प्यार करने का कोई हक़ नहीं है, कोई भी अच्छी चीज़ अब उनके लिए नहीं बची, उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं और मुझे उन्हें जीवन के परिचित ढर्रे से और – काम से भी, विचलित नहीं करना चाहिए, मगर फिर भी ज़िन्दगी भर वह मेरा ध्यान रखेंगे.
रात भर मैं सो नहीं सकी. एक एक मिनट बाद मैं बालकनी में भागती, सुबह की आहट को सुनती रही, पोतापोव स्ट्रीट के छोटे-छोटे लाईम-ट्रीज़ के नीचे स्ट्रीट-लैम्प्स को बुझते हुए देखती रही...
बाद में इनके बारे में लिखा गया था:
स्ट्रीट लैम्प्स की धुंधली तितलियों ने,
छुआ सुबह को पहली थरथराहट से...
और सुबह छह बजे – घंटी बजी. दरवाज़े के सामने – बी.एल.. पता चला कि वह पैदल-पैदल अपनी समर कॉटेज गए और वापस आए, पूरी रात शहर में घूमते रहे...
हमने ख़ामोशी से एक दूसरे का आलिंगन किया...
वो शुक्रवार का दिन था, चार अप्रैल सन् सैंतालीस. मम्मा अपने पति और मेरे बच्चों के साथ दिन भर के लिए पोक्रोव्स्कोए-स्त्रेश्नेवो घूमने चली गई.
और, जैसे नवविवाहित जोड़े अपनी पहली रात मनाते हैं, उसी तरह हमने ये अपना पहला दिन मनाया. मैंने उनकी सिलवटों वाली पतलून पर इस्त्री की. वे अपनी सफ़लता से बड़े उत्साहित और प्रसन्न थे. वाक़ई में “ऐसी शादियाँ भी होती हैं जो, पति और पत्नी से भी ज़्यादा रहस्यमय होती हैं.”
कितनी साफ़गोई से, और अपनी आत्मा तथा चरित्र की सादगी से बाद में उन्होंने लिखा और कहा था:
 “भावनाओं के अधिकारों और ज़रूरतों  की ही तरह ‘स्वच्छन्द प्रेम’ का विचार  भी मेरे लिए अपरिचित है. ऐसी चीज़ों के बारे में सोचना और बात करना उसके लिए ओछा काम था. अपनी ज़िन्दगी में उसने कभी गुलछर्रे‘ नहीं उड़ाए, अपने आप को कभी अर्ध-ईश्वरों और अतिमानवों की श्रेणी में नहीं रखा, अपने लिए कभी विशेषाधिकारों और सुविधाओं की मांग नहीं की.” (डॉक्टर झिवागो, 1954).
 “मैं नैतिकता के प्रश्नों का निर्णायक नहीं हूँ, और न ही उसके विभिन्न रूपों का विरोधक...  ‘भावनाओं के अधिकारों’ के बारे में, ‘स्वच्छन्द प्रेम’ के बारे में और मनुष्य की निकटता के विभिन्न रूपों के बारे में फ़लसफ़ा बघारने की कल्पना से ही मुझे मतली होने लगती है.” ( 7.5.58 को रेनाटे श्वैत्सर को लिखे पत्र से).                     
 “मैं किसी भी तरह के नियमों के ख़िलाफ़ हूँ – क्या ‘दोमोस्त्रोय’ में वर्णित आधार पर गठित परिवार होना चाहिए, या स्वच्छन्द प्रेम – हर हालत में अलग-अलग संभावनाएँ हो सकती हैं. किन्हीं नियमों की ज़रूरत नहीं है, ज़िन्दगी ख़ुद ही ज़रूरत के मुताबिक फ़ैसला कर लेगी. ..” (2.11.59 को एक महिला को दी गई मुलाक़ात से).
 और, अभी हाल ही में:
 “... जीनियस और सुन्दरी : ये  शब्द कब के एक समान ओछे हो गए हैं. और उनमें समानता क्या है...कुछ परिपूर्ण सा ‘मैं – तुम हो’ उन्हें दुनिया में सभी संभावित संबंधों द्वारा जोड़ता है और गर्व से, उत्साह से, और थकावट से उनकी आकृतियों को एक ही मेडल से जड़ देता है.”
इस ख़ुशनुमा दिन की सुबह बी.एल. ने अपनी कविताओं की लाल पुस्तिका पर लिखा:
 “मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते, ओह, कितना प्यार करता हूँ मैं तुझसे.
                         4 अप्रैल. 1947”
इस लाल पुस्तिका की भी अपना ही किस्सा है. सन् ’49 में, मेरी पहली गिरफ़्तारी के समय मुझसे वे सारी किताबें छीन ली गईं, जो बोर्‍या ने मुझे भेंट दी थीं. और जब पूछताछ ख़त्म हो गई और मुँहासों वाले नौजवान लेफ्टिनेंट की ‘त्रोयका’ ने मुझे सज़ा सुना दी – तो बोर्‍या को लुब्यान्का बुलाकर मेरी किताबें सौंप दी गईं – और उसने वो पन्ना फाड़ दिया.  फिर एक दूसरी सुबह, जब मैं कैम्प से लौट आई थी और हम फिर से सुखी थे, बल्कि पहले से ज़्यादा ख़ुश – मैंने बोर्‍या को ताना दे ही दिया – वो ऐसा कैसे कर सका? अब कवर-पेज के पीछे की ओर उसके हाथ से लिखा था: “मैंने वो लिखावट वाला पन्ना फाड़ दिया, जब उसे घर लाया था. तुम्हें उसकी क्या ज़रूरत है?”
ख़ामोशी से मैंने यह पढ़ा और अपनी ओर से नीचे लिख दिया: “कहने को कुछ बचा ही नहीं है, अच्छा किया: अगर न फ़ाड़ा होता तो ये किताब ख़ुशी के दिनों की यादगार बन जाती – मगर अब है – दुर्भाग्य की, विनाश की! हाँ!”


तब बोर्‍या ने अपनी तस्वीर निकाली, जो वो साथ में लाया था, उसके पीछे 1947 में लिखी इबारत का एक एक अक्षर दुहराया, और उसके नीचे वही तारीख डाली और उसके नीचे लिखा: “ये इबारत अमर है और हमेशा के लिए वैध है. और वह सिर्फ बड़ी ही होती जाएगी.” मगर ये लिखा था सन् 1953 में.

रविवार, 17 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.3

1.3
....बेचैन ख़ुदा

मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सन् 1946 की ओर लौटती हूँ.
संपादकीय ऑफ़िस में ख़ुदा से मुलाक़ात के दूसरे दिन मैं संपादक मंडल की मीटिंग से हमारे लाल कमरे में हमेशा की अपेक्षा काफ़ी देर से लौटी. ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने, जो प्रवेश द्वार के पास अपनी सचिव वाली कुर्सी पर बैठी थी, कहा:
 “आपका प्रशंसक यहाँ आया था, देखिए वो आपके लिए क्या छोड़ गया है.”
मेज़ पर अख़बारी कागज़ में लिपटा हुआ पैकेट पड़ा था: कविताओं और अनुवादों की पाँच छोटी-छोटी किताबें.
फिर तो हर चीज़ ख़तरनाक तूफ़ान की गति से बढ़ती गई. बोरिस लिओनीदोविच लगभग हर रोज़ मुझे फोन करते, और मैं, अपने अंतर्मन में उनसे मिलने और बात करने से घबराते हुए, ख़ुशी से सन्न, बेतरतीब सा जवाब देती: “आज मैं व्यस्त हूँ”. मगर लगभग हर रोज़ दफ़्तर का समय ख़त्म होते होते वो ख़ुद संपादकीय दफ़्तर में प्रकट हो जाते और अक्सर हम लोग गलियों से, राजमार्ग से, स्क्वेयर्स से होते हुए पैदल- पैदल पोतापोव्स्काया मार्ग तक आते.
 “अगर आप चाहें तो मैं आपको ये स्क्वेयर तोहफ़े में दे दूँ? नहीं चाहतीं?” मैं, बेशक, चाहती.
एक बार उन्होंने संपाद्कीय दफ़्तर में फोन किया और कहा:
 “क्या आप मुझे अपना कोई और टेलिफोन नंबर दे सकतीं हैं, मतलब, किसी पड़ोसी का, मेरा दिल आपसे सिर्फ दिन में ही नहीं, शाम को भी बातें करना चाहता है.”
ओल्गा निकोलायेव्ना वोल्कोवाया का टेलिफोन नंबर देना पड़ा, जो हमारे फ्लैट से एक मंज़िल नीचे रहती थी. पहले मैंने ऐसा कभी नहीं किया था.
और फिर शाम को गरम पानी के पाईप पर टक्-टक् होने लगी – मुझे मालूम हो जाता कि ये निचली मंज़िल के फ्लैट से ओल्गा निकोलायेव्ना मुझे बुला रही है.
बी.एल. (बोरिस लिओनीदोविच – अनु.) किन्हीं गूढ़ विषयों से एक अंतहीन बात शुरू करते. कुछ चालाकी से, जैसे बातों-बातों में वो दुहराते: “अपने फूहड़पन के बावजूद, मैं कई बार औरतों को रुलाने का कारण बना हूँ...”
और अब, ऐसा लगा, जैसे वो फिर से पुराने इतिहास से गुज़र रहे हैं, जब उन्हें किसी मैडम वी. के ट्यूटर के रूप में काम करना पड़ा था. इस किस्से का वर्णन “सुरक्षित दस्तावेज़” में किया गया है. न जाने क्यों, मैं उनकी पहली प्रेमिका की याद दिलाती थी. उसे “बालों की कंघी से पैरों तक” वह “”शेक्सपियर के नाटक की तरह” “मुँहज़बानी” जानते थे. उसने इनकार कर दिया. और उसके इनकार ने मेरे प्रीतम को सिसकते हुए कहने पर मजबूर किया:
(कितनी सुन्दर हो तुम!) – ये दमघोंटू बवण्डर –
क्या कह रहे हो? होश में आओ! ख़त्म हो गया. ठुकरा दिया.”
वी. के रिश्तेदारों को नौजवान कवि की अस्थिर ज़िन्दगी से परहेज़ था और उन्होंने वी. को इनकार करने पर मजबूर कर दिया. कहते हैं – वो भयानक ग़रीबी में मरी.
“मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी मेरी वजह से रोना पड़े. मगर हमारी मुलाक़ात बेकार नहीं जाएगी – न तुम्हारे लिए, न मेरे लिए.”
घर पहुँचकर मैंने बी.एल. को कविता लिखी:
पहले दिन से अधमुँदी पलकों को,
मुश्किल से खोला ही था मैंने,
और जिसने – प्यार नहीं था किया तुमको
आ गई मुझसे बाँटने...
टेलिफोन के तार, गुज़रते हैं
तुम्हारे और मेरे ऊपर से
गुज़र गई तूफ़ान की तरह तेरी जवानी
ख़ुदा में विश्वास न करते देश के ऊपर से...
और इसी तरह का कुछ और.
आधे मॉस्को से गुज़रती इन लम्बी सैरों के दौरान हमारी बातचीत काफ़ी गड्ड्-मड्ड् होती थी और उसको लिख कर रखना असंभव था. बी.एल. को अपने दिल का “बोझ हल्का करना” होता था और, मैं बस घर पहुँचती ही थी कि गर्म पानी वाले धातु के पाईप से खट्-खट् की आवाज़ आने लगती. मैं, सिर धुनते हुए, फिर से निचली मंज़िल पर अधूरी बातचीत की तरफ़ भागती, और बच्चे विस्मय से मेरी ओर देखते रहते.
जल्दी ही “नोवी मीर” में एक जवान, प्यारी, अपरिचित ज़नाना आवाज़ ने मुझे फोन किया. ये ल्यूस्या पोपोवा थी जो बोरिस लिओनीदोविच के कहने पर फोन कर रही थी. जल्दी ही वह मुझसे मिलने घर पर आई. छोटी सी, भूरे बालों वाली गुड़िया, उसका चेहरा लिओनार्दो की परी जैसा था. ये ड्रामा-इन्स्टीट्यूट के एक्टिंग विभाग की विद्यार्थिनी थी, जो बाद में पेंटर बन गई. सन् 1944 में पॉलिटेक्निक-म्यूज़ियम में हुई काव्य-संध्या के बाद वह निर्गम-द्वार के पास पास्तरनाक का इंतज़ार कर रही थी, और जैसे ही वो बाहर निकले उनके पास अपना परिचय देने के लिए गई. मगर अपने ही साहस से वह इतना घबरा गई, इतनी गड़बड़ा गई कि कुछ-कुछ अनाप-शनाप कहने लगी. बी.एल. ने अपने बेटे से उसका परिचय करवाया और हौसला देती मुस्कुराहट से (जैसे वह ख़ुद ही कुछ भी कहने में असमर्थ हैं, न कि लड़की) कहा: “मैं थक गया हूँ और आपकी किसी भी बात का जवाब नहीं दे सकता, मुझे माफ़ कीजिए. ये रहा मेरा टेलिफोन नंबर, मुझे फोन कर लीजिए, हम मिलकर बात करेंगे. गुड लक.” और जाते जाते मुड़ कर बोले, “फोन ज़रूर कीजिए, बेहतर है बुधवार को...”

और इसके बाद ल्यूस्या ने मुझे टेलिफोन करने की कहानी सुनाई:

 “एक बार मुझे बी.एल. का एक पोस्ट-कार्ड मिला: आ जाईये,” उन्होंने लिखा था, “मेरा आपसे मिलना बहुत ज़रूरी है.”

मैं उनके पास गई. उनका चेहरा ऐसा दमक रहा था, जैसे बर्थ-डे बॉय का होता है:

 “आप जानती हैं, ल्यूस्या,” उन्होंने दमकते हुए कहा, “मुझे प्यार हो गया है.”

 “अब आप की ज़िन्दगी का क्या होगा, बोरिस लिओनीदोविच?” मैंने ज़िनाईदा निकोलायेव्ना के चेहरे की कल्पना करते हुए पूछा.

 “ हाँ, ज़िन्दगी में रखा क्या है, क्या रखा है ज़िन्दगी में, अगर प्यार नहीं है तो?” उन्होंने जवाब दिया.  “और वो इतनी सम्मोहक है, वो इतनी ख़ुशनुमा है, इतनी सुनहरी है. अब मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश किया है इस सुनहरे सूरज ने, ये इतना अच्छा है, इतना अच्छा है. नहीं जानता था कि मैं अभी भी ऐसी ख़ुशी महसूस करूँगा. वो ‘नोवी मीर’ में काम करती है. मैं चाहता हूँ कि आप उसे फोन करें और उससे मिलें.”

 “बेशक, हम मिलेंगे,” मैंने दमकते बोरिस लिओनीदोविच से कहा.

और मैंने ‘नोवी मीर’ में फोन किया.

बुधवार, 13 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.2

1.2
कैसे होता है आरंभ कविता से जीने का

मेरी युवावस्था के दिनों में मेरे सहपाठी और समकालीन लोग पास्तरनाक के बेहद दीवाने थे. पास्तरनाक की कविता को पहली बार मेरे घर लाया था खोल्मिन. बसंत के रास्तों पर कितनी बार मैं घूमी हूँ उन सम्मोहित करते शब्दों को दुहराते हुए जो पूरी तरह मुझ तक न तो पहुँचे थे, न ही समझ में आए थे.
अपनी नीली आँखों को आधा मूँदे, येसेनिन जैसे सुनहरे बालों को जानबूझकर बिखेरते हुए खोल्मिन पास्तरनाक के संकलन “बहन मेरी ज़िन्दगी” और “बाधाओं से ऊपर” से कविताएँ सुनाता. मुझे ऐसा लगता था कि वो किसी और के उन्माद के प्रभाव में प्रलाप कर रहा है! और तब से दिमाग में रह गई है रात में भटकते हुए मुसाफ़िर की वह शोकपूर्ण स्वीकारोक्ति:
नहीं है ये वो शहर, ना ही है वो रात
भटक गया है तू, दूत उसका!

उस समय मैं कह नहीं पाती थी कि आधी बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है, मगर मंत्रमुग्ध सी खोल्मिन के मुँह की ओर देखती रहती. मगर अपनी संवेदना से मैं तभी से समझ गई थी कि ये ‘ख़ुदा’ के शब्द गूँज रहे हैं, सर्वशक्तिमान ‘तफ़सील के ख़ुदा’ के शब्द, सर्वशक्तिमान ‘प्यार के ख़ुदा’ के शब्द.
फिर हुई मेरी पहली दक्षिण की यात्रा, मेरी पहली यात्रा सागर की. खोल्मिन ने, जो मुझे छोड़ने आया था, मुझे पास्तरनाक के गद्य की छोटी सी किताब पकड़ा दी - हल्के गुलाबी-जामुनी रंग की, खुरदुरे कवर की लम्बी स्कूल-एक्सरसाईज़ बुक की शकल की. ये थी ‘ल्युवेर्स का बचपन’. ऊपर की बर्थ पर लेटे हुए, मैंने फिर से असाधारण तक पहुँचने के लिए संकेत-शब्द ढूँढ़ने की ज़िद्दी कोशिश की: एक मर्द किसी युवती की रहस्यमय दुनिया में इस तरह प्रवेश कैसे कर सका?
सोची के सेनिटोरियम में आने के बाद मैं अक्सर एकांत में इस आश्चर्यजनक किताब के साथ रहती थी. उस समय की अपनी बेवकूफ़ी भरी कविताओं में मैंने लिखा था: 
पास्तरनाक के गद्य के बादल
और मेरे सपने छाए हैं मेरी मेज़ पे...
.
मैं आज भी समझ नहीं सकती कि युवावस्था में ही इस अविश्वसनीय, क्लिष्ट आविष्कार की गहराई में पैंठने की मेरी इच्छा कैसे हुई. बस, मैं खिंचती गई.
युवावस्था से ही गुमिल्योव से बेहद प्रभावित, तब मैं पास्तरनाक के पास उनकी एक पंक्ति लेकर गई थी, जिसने मुझ पर जादू कर दिया था:
अद्भुत संदिग्धता की सौगात मिली है तुझे कवि...
फिर मुझे यक़ीन हो गया कि जब उनके अत्यंत कठिन काव्यात्मक प्रतीकों को समझने की ज़रा सी भी असमर्थता के कारण  उन्हें ‘संदिग्धता’ की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता और बोरिस लिओनीदोविच को इसका दोष दिया जाता, तो वे बहुत गुस्सा हो जाते थे.
उनकी राय में, इन प्रतीकों की स्पष्टता और उनके बीच के संबंध के रहस्य को सिर्फ वही व्यक्ति महसूस नहीं कर सकता था जो कविता के प्रति बहरा हो, या फिर जिस पर साहित्यिक परंपराओं ने लगाम लगाई हो, पहली नज़र में बन्दी प्रतीत होते प्रतीकों और रूपकों को अपनी ही चाभी से आज़ाद करना जिसके बस के बाहर हो. और अगर वो उन्हें आज़ाद न कर पाता हो, तो अपनी इस असमर्थता को छुपाने के लिए, बेवजह ही चुगली करने वाले लेख न लिखे.      
कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी उस अज्ञात का रहस्य सम्मोहित करता था, जो अब तक अनसुलझा और अप्राप्य था. काव्यात्मक प्रतीकों का भेद खोलने में सबसे बड़ी बाधा थी - पर्याप्त तैयारी का अभाव, और उन्हीं साहित्यिक परंपराओं का प्रभाव. मगर समस्या का समाधान आसपास ही मौजूद था : बसंत – कपड़ों की छोटी सी पोटली / “अस्पताल से छुट्टी पाए मरीज़ की”. बसंती वृक्षों की टहनियों पर चिपके मोम के शेष टुकड़े को – कलियों का नाम देना ज़रूरी नहीं है! और बिन-होठों की पत्ती, शिशिर की दूत, और बगीचे की स्तम्भों वाली रचना, जो आसमान को थामे हुए हो... – सब कुछ आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट था. हाँ, ये कोई जादू था, और चमत्कार भी, और हो सकता है महान कवि को प्रदत्त “संदिग्धता”. ऐसा लगता था जैसे तुम्हारे ही द्वारा अब तक ‘अज्ञात’ का आविष्कार होगा, जिसे ख़ुदा ने एक बन्द दरवाज़े के पीछे तुमसे छुपा कर रखा है. उन महान तोहफ़ों को लेने में हाथ अभी झिझक रहे हैं, कमज़ोर हैं, मगर महानता से देने वाले और नम्रता से लेने वाले के बीच का संबंध – स्थापित हो चुका था.                

पोतापोव्स्काया स्ट्रीट वाले मेरे छोटे से कमरे में इन ख़ूबसूरत जटिलताओं को समझने की दिशा में मेरे पहले क़दम बढ़ रहे थे. फिर आश्चर्यजनक रूप से सही और सरल उत्तर प्राप्त हो गए....