1.5
“ललचाती है ख़्वाहिश, रिश्तों को तोड़ देने की”
हाँ, चार अप्रैल सन् 47! इसी दिन से शुरू
हुई थीं हमारी “शहर में गर्मियाँ”. मेरा और बी.एल. का, दोनों के ही फ्लैट्स ख़ाली
थे. हम लगभग हर रोज़ मिलते.
मैं अक्सर सुबह सात बजे छोटे-छोटे घरों
वाला और लम्बी पूंछ वाला अपना जापानी गाऊन पहने उसके लिए दरवाज़ा खोलती – “डॉक्टर
झिवागो” की एक कविता में यह अमर हो गया है:
घर के लोगों को भेज दिया मैंने बाहर,
कब के बिखर गए परिवार के लोग,
तनहाई से हमेशा की पुरज़ोर,
भर गया है दिल, और प्रकृति की
हर चीज़.
......
....उसी तरह फेंकती हो तुम अपनी
पोषाक,
क्यारी में जैसे गिरते पत्ते
गाऊन में रेशमी फुंदने के
जब गिरती हो मेरी बाँहों में.
तुम – मसर्रत हो विनाश के पथ में,
जब जीवन हो बीमारी से भी बदतर,
और सुन्दरता का मूल – साहस,
खींचे हमें एक दूजे की ओर.
उन गर्मियों में लीपा के पेड़ों पर ग़ज़ब की
बहार आई थी, वृक्ष-वीथियाँ शहद की सुगन्ध से महक रही थीं. उषःकाल की विस्मयकारी अधूरी नींद,
हमारे प्यार के उन दिनों में – और जन्म लिया चिस्तीये प्रूदी के लीपा वृक्षों की
चिर अनिद्रा के बारे में कविता ने. बी.एल. मेरे छोटे से कमरे में सुबह छह बजे
आते...उनकी नींद, बेशक पूरी नहीं हुई होती – और इसका मतलब था कि न तो वृक्षवीथी
की, न घरों की, और ना ही स्ट्रीट-लैम्प्स की नींद पूरी हुई थी.
एक बार मैंने अपने बालों को मम्मा की कछुए
की शल्क वाली कंघी से संवार कर सिर के ऊपर बांध लिया था, और आईने में देखती हुई
“हेल्मेट वाली औरत” का जन्म हुआ...” मुझे चोटियों वाले इस सिर से बेहद प्यार है!”
अब - हम, वैसे, पहले जैसे, कब के नहीं रहे;
मगर मम्मा की कंघी – उस समय के मेरे घने बालों में, और ठीक से सो न सके लीपा के
वृक्ष, कविता में समा गए और हमसे – मुझसे, बी.एल. से, पोतापोव स्ट्रीट वाले छोटे
से कमरे से – पृथक, अपने स्वतंत्र अस्तित्व में हैं.
हमारे उन “विद्युन्मय” दिनों में शोकपूर्ण
स्वरों के बावजूद काफ़ी कुछ मज़ेदार भी था.
एक बार, बिल्कुल आरंभिक दिनों में, ठण्डे
रास्तों पर काफ़ी घूमने के बाद, मेरे छोटे-से कमरे की गर्माहट में बैठे हुए (शायद
हमारे परिवार में वह दूसरी बार आए थे), बी.एल. कुर्सी से उठकर मेरी ओर दीवान की
तरफ़ लपके. दीवान इतना पुराना था कि फ़ौरन टूट गया – उसकी टांग टूट गई. बोरिस
लिओनीदोविच फ़ौरन उछले, “ये दुर्भाग्य है! क़िस्मत ख़ुद,” उन्होंने उत्तेजित स्वर में
कहा, “मेरे अवांछनीय बर्ताव की ओर इशारा कर रही है!”
दूसरी बार, काफ़ी समय के पश्चात्, जब हम
अक्सर कैफ़ियत देते और झगड़ते थे, एक और किस्सा हुआ, जिसे याद करके मैं आज भी
मुस्कुराने लगती हूँ. बोरिस लिओनीदोविच को पिछली शाम को मेरे द्वारा किए गए ‘नाटक’
का बदला लेना था. मगर मैं समझौता करना चाहती थी, मैंने फूलदानों में कई सारे गहरे नीले
रंग के फूल सजा दिए.
“ये नीले रंग के हैं,” बी.एल. ने गुस्से से कहा,
“और वैसे भी – घास-पात है.”
बाद में पता चला कि उन्हें कमरे में फूल
पसन्द नहीं हैं, हालाँकि अपनी परिचित महिलाओं को ख़ुद भी फूल ही भेजा करते थे.
बी.एल. को पारिवारिक झगड़े पसन्द नहीं थे.
ज़ाहिर है कि मुझसे मुलाक़ात से पहले वह ऐसे कई प्रसंगों से गुज़र चुके थे. इसलिए जब
मैं कोई गंभीर बात की शुरूआत करती, वो पहले ही सतर्क हो जाते. मेरे जायज़ तानों के
जवाब में अपनी गहरी आवाज़ में भुनभुनाने लगते.
“नहीं, नहीं, ओल्यूशा! हम दोनों ऐसे तो नहीं
हैं!
ये
किसी बुरे उपन्यास का दृश्य है.
ये तुम हो ही नहीं सकतीं!”
और मैं ज़िद्दीपन से अपनी बात पे ज़ोर देती,
“नहीं, ये मैं ही हूँ, बिल्कुल मैं ही! मैं एक ज़िन्दा औरत हूँ, मैं कोई तुम्हारी
कल्पना नहीं हूँ!”
हम अपनी-अपनी बात पर अड़े रहते.
रिश्तेदारों की किचकिच ने कितने सारे
ख़ूबसूरत लमहों को बरबाद कर दिया. मेरे कानों में लगातार भिनभिनाते कि बी.एल. को
अपनी ज़िन्दगी बदलनी चाहिए, अगर वह मुझसे प्यार करता है तो अपने परिवार को छोड़ दे
वगैरह, वगैरह.
मम्मा के बारे में कोई भी बुरी बात नहीं
कहना चाहती, मगर उसका क़ुसूर भी कम नहीं था. कभी वो बी.एल. के साथ बेवकूफ़ी भरे नाटक
करती, जैसे कि उन्हें फोन कर दिया और कहा कि उनके कारण मैं बीमार हो गई हूँ, जबकि
मुझे सिर्फ फ्लू हुआ था; कभी, जब वो दो-तीन दिन आ नहीं पाते थे, तो उनकी कठोर-हृदयता
से तैश में आ जाती.
“आपकी बेटी से मैं अपनी ज़िन्दगी से भी ज़्यादा
प्यार करता हूँ, मारिया निकोलायेव्ना,” - बी.एल. ने मम्मा से कहा, - “मगर इस बात
की उम्मीद न रखिए कि बाहरी तौर पर हमारी ज़िन्दगी अचानक बदल जाएगी.
बेशक, मम्मा मातृत्व की भावना से ही काम
कर रही थी; अपनी समझ के अनुसार, वह मेरे लिए स्थायी सुख चाहती थी. उसे ऐसा लगता कि
वह पति के रूप में मेरे पास आये, चाहे फिर चला जाये, और दो-तीन दिनों तक न भी आए
तो कोई बात नहीं है: उसे, बेशक, हमें फ़ौरन आशीर्वाद देने की ख़्वाहिश थी, मगर हमारा
किस्सा भी चेखव के लाझेच्निकोव वाली तस्वीर जैसा ही चलता रहा.
मैं बोर्या को पति से बढ़कर मानती थी.
उसने मेरी ज़िन्दगी के सभी पहलुओं पर अधिकार कर लिया था, एक भी कोना ऐसा नहीं छूटा
था, जहाँ उसका दख़ल न हो. मेरे बच्चों के साथ, ख़ासकर बड़ी हो रही ईरीन्का के साथ,
उसका प्यार भरा, नज़ाकतभरा व्यवहार मुझे बड़ी ख़ुशी देता था.
हमारी इस शोकांतिका के आरम्भिक दिनों में,
ईरीना के बी.एल. के प्रति व्यवहार पर मम्मा का काफ़ी प्रभाव था. शुरू में, जब वह मुझे उसकी तस्वीरें कभी
उतारते, कभी लगाते देखती, तो अपने होंठ भींचकर नफ़रत से कहती: “आत्मसम्मान तुममें
है ही नहीं, मम्मा!...”
मगर जैसे जैसे वह बड़ी होती गई, सब बदल
गया. “मैं तुम्हें समझ सकती हूँ, मम्मा” – आख़िर में उसने मुझे बी.एल. की तस्वीर
वापस लगाते हुए देखकर कहा.
किसी बड़े आदमी ने बच्चों से कह दिया,
“बच्चों, तुम ध्यान रखना, हमारे ‘क्लासिक’ के साथ गुज़ारा हुआ हर पल तुम्हारे लिए
बहुमूल्य होना चाहिए!” और इस औपचारिक और आदरसूचक शब्द “क्लासिक” से ईरीना के होठों
से अचानक निकला प्यार भरा शब्द “क्लास्यूशा”...
”क्लास्यूशा” उसके लिए दुनिया में सबसे
निकटतम व्यक्ति बन गया, अत्यंत संवेदनशीलता से वह उसकी प्यारी-प्यारी कमज़ोरियों
को, उसके बड़प्पन को, उसकी दरियादिली को महसूस करती थी.
मगर तब बात बच्चों की नहीं थी.
मैं भी अक्सर समझदारी से काम नहीं लेती,
और कई ख़ूबसूरत पलों को बरबाद कर देती. रिश्तेदारों के ताने मुझ पर असर दिखाए बिना
न रहते, और मैं उस पर अपने अधिकार जता बैठती. उन बेवकूफ़ी भरे तमाशों को याद करके
तकलीफ़ होती है और शर्म आती है. रास्तों पर जी भर के घूमने के बाद, ग़ैरों के प्रवेश
द्वारों पे कभी लड़ते, तो कभी सुलह करते हुए, बोर्या ने इस बारे में लिखा:
....मैं
फिर से बनाता हूँ बहाने,
और फिर
सब लगता है बेमानी मुझे.
जाती है
पड़ोसन, पिछवाड़े का चक्कर लगाके,
देती है
हमें पल तनहाई के.
* * *
न रो, न
सिकोड़ सूजे हुए होठों को,
न भींच उन्हें
बेदर्दी से.
सताएँगी सूखी
दरारें उनको
बसंत में
बुखार के बाद थीं जैसे.
मेरे
सीने से हटा ले अपना हाथ,
हम तो
तार हैं विद्युत-प्रवाह के.
देखना,
फिर से कुछ न कुछ,
फेंकेगा
एक-दूजे की ओर हमें.
*******
मगर रात
जकड़ ले चाहे,
कितने भी
दर्दनाक फंदे में मुझे,
शिद्दत
से चाहता है दिल वापस लौट आने को,
और
ललचाती है ख़्वाहिश रिश्तों को तोड़ देने की.
“नहीं,
नहीं, सब ख़त्म हो गया, ओल्यूशा,” – तलाक की और एक कोशिश के बाद बी.एल. ने ज़ोर देकर कहा,
“बेशक, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मगर मुझे जाना होगा, क्योंकि परिवार से तलाक की
भयंकरता को बर्दाश्त करने की ताक़त मुझमें नहीं है – (ज़िनाईदा निकोलायेव्ना को अब
तक मेरे बारे में पता चल गया था, और वह बी.एल. के सामने तमाशे करने लगी थी) – अगर
तुम इस बात से समझौता नहीं करना चाहतीं कि हमें एक ऊँची दुनिया में रहना होगा और
किसी अज्ञात शक्ति का इंतज़ार करना होगा जो हमें मिला सकेगी, तो बेहतर है कि हम अलग
हो जाएँ. किसी और की बरबादी के भग्नावशेषों पर मिलना ठीक नहीं है.
मगर हम, बार-बार, “विद्युत-प्रवाहित तार”
थे – अलग होना हमारे बस में ही नहीं था.
एक बार बी.एल. का छोटा बेटा लेन्या बेहद
बीमार हो गया. और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने बीमार बेटे के बिस्तर के पास बी.एल. से
वचन ले लिया कि वह मुझसे कभी नहीं मिलेंगे. तब उन्होंने ल्यूस्या पोपोवा से विनती
की कि वह मुझे इस निर्णय की सूचना दे दे. मगर उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि ये
उन्हें ख़ुद ही करना चाहिए.
मुझे याद है कि मैं ल्यूस्या के फूर्मानोव
स्ट्रीट वाले घर में बीमार पड़ी थी. अचानक वहाँ आंधी की तरह ज़िनाईदा निकोलायेव्ना
घुसी. उसे और ल्यूस्या को मुझे अस्पताल पहुँचाना पड़ा, क्योंकि रक्तस्त्राव के कारण
मेरी हालत बहुत ख़राब हो गई थी. और अब मुझे याद नहीं है कि इस हट्टी-कट्टी, कड़े
स्वभाव की औरत से हमने क्या बातें कीं, जो लगातार यह दुहरा रही थी कि वह मेरे
प्यार पर थूकती है, वह बी.एल. से प्यार नहीं करती, मगर इस बात की भी इजाज़त नहीं
देगी कि उसका परिवार नष्ट हो जाए.
अस्पताल से मेरे वापस लौटने के बाद बोर्या
इस तरह आया जैसे कुछ हुआ ही न हो और बड़े मर्मस्पर्शी तरीके से मम्मा के साथ समझौता
कर लिया, उसे यह समझाते हुए कि वो मुझसे कितना प्यार करता है. मम्मा को उसके इन
तरीकों की आदत हो चुकी थी.
और एक और कोशिश रिश्तों को तोड़ने की. सन्
1953 चल रहा था. कैम्प से मेरी वापसी नज़दीक आ रही थी. कितना दुखी था वह मेरे लिए,
मेरी रिहाई के लिए उसने कितनी कोशिशें की थीं, ये उन हृदयस्पर्शी पोस्टकार्ड्स से भी ज़ाहिर होता है
जो उसने मम्मा के नाम से पोत्मा-कैम्प में मुझे लिखे थे. मैं उन पोस्ट-कार्ड्स को
अपने साथ वापस ला सकी थी.
ये कह सकते हैं कि उनके दिल के पहले दौरे
की वजह हमारी जुदाई ही थी; उनकी उस समय की बेहतरीन कविताएँ इस जुदाई के विषय पर ही
लिखी गई थीं:
देखता है इन्सान देहलीज़ से,
नहीं पहचानता घर को...
हमारी मुलाक़ात उसे सपने में एक चमत्कार की
तरह प्रतीत हुई:
ढाँकती है बर्फ़ रास्ते को,
दफ़न करती ढलवाँ छतों को.
जाता हूँ, टांगें सीधी करने, -
खड़ी हो तुम दरवाज़े के पीछे...
और, जब भाग्य हमें सचमुच में मिलाने वाला
था, तो उसे ऐसा लगा कि मैं अब वो नहीं रही, और वह भी वो नहीं है, और ज़िनाईदा
निकोलायेव्ना ने उसे दिल के दौरे से बचाया है, और उसके प्रति समर्पण और धन्यवाद की
भावना के ऐवज में व्यक्तिगत ज़िन्दगी का त्याग करना चाहिए. और बी.एल. ने पन्द्रह साल की ईरा को चिस्तोप्रूद्नी-मार्ग
पर बुलाया और उसे एक अजीब सा काम सौंपा. बच्ची को अपना माँ से, जो क़रीब चार साल की
कैद के बाद कैम्प से वापस लौट रही थी, ये संदेश देना था: वह मुझसे प्यार करता है,
सब कुछ ठीक था, मगर अब हमारे रिश्तों में कुछ परिवर्तन आ सकता है.
अफ़सोस की बात है कि उस समय ईरा कोई
नोट्स-वोट्स नहीं लेती थी. इसलिए उनके शब्दों की असली लज़्ज़त - एक मासूम आकर्षण और
साथ ही एक निर्विवाद कठोरता का मिश्रण – सुरक्षित नहीं रह पाई.
अपने निकटतम व्यक्ति में परिवर्तन के उसके
भय को मैं जानती थी. अपनी बहन लीदिया से मिलने से वह पूरी शिद्दत से बचते रहे, जिसकी याद एक
जवान, ख़ूबसूरत लड़की के रूप में उनके दिमाग़ में बसी थी. “कितना भयानक लगेगा,” उसने
मुझसे कहा था, “जब हमारे सामने एक भयंकर बूढ़ी, और हमारे लिए नितांत अपरिचित औरत
प्रकट होगी.”
मुझे यक़ीन है कि उसे ये डर था कि कैम्प के
बाद मैं भी वैसी ही बूढ़ी नज़र आऊँगी. इसीलिए ईरा को ये नाज़ुक ज़िम्मेदारी उसने दी थी
– कि हो सकता है कि ज़िन्दगी पहले जैसी न रह पाए.
और अचानक उसने देखा कि मैं तो वैसी ही
हूँ. हो सकता है, कुछ और दुबली हो गई थी. बी.एल. के प्रति मेरा प्यार और मेरी उससे
निकटता मुझमें नवजीवन का संचार कर देते थे.
मतलब, जुदाई से तितर-बितर हो गई हमारी
ज़िन्दगी अचानक उसके लिए एक अप्रत्याशित उपहार लेकर आई – और “गर्म हाथों के
आलिंगनों का जादू” और दुनिया के उत्सव में दो दिलों की विजय से बढ़कर और कुछ भी
नहीं था.
हमें जैसे किसी जुनून भरी नज़ाकत और हमेशा
साथ रहने के निश्चय ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. और राजमार्ग वाले अपने उस काम
के बारे में ईरा ने मुझे बी.एल. की मृत्यु के कई सालों बाद बताया...
हाँ, थी चाहत रिश्तों को तोड़ने की - उसके,
कवि के भीतर - मगर एक दूसरे के प्रति हमारे मानवीय आकर्षण की हमेशा जीत हुई, मानो
हम एक दूसरे के बगैर साँस भी नहीं ले सकते थे. हर मुलाक़ात – पहली मुलाक़ात थी, -
उसका सिर ख़ामोशी से अपने सीने से चिपटाती. सुनती, दिल कैसी बदहवासी से धड़क रहा है.
और सन् 1960 के मई के उस आख़िरी, दुर्भाग्यशाली दिन तक ये ऐसा ही रहा. मेरे अंतर्मन
में वह बूढ़ा हो जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता था.
मुझे याद है कि स्टालिन की मृत्यु के बाद,
जब मैं यातना-कैम्प से वापस आई, तो बी.एल. ने अपनी प्रतीकात्मक परीकथा लिखी, जो
मेरी ‘क़ैद’ और आज़ादी को समर्पित थी. अगर उसमें उसने मुझे एक परी के रूप में चित्रित
किया था, जिसे ड्रैगन ने पकड़ लिया था, तो शायद, स्वयँ को वह रक्षक समझ रहा था जो
जंगल, नदियाँ, सदियाँ पार करके परी को बचाता है, और निःसंदेह यह यक़ीन करना चाहता
था कि उसके नाम ने ही मुझे क़ैद से छुड़ाया है. “हालाँकि, मैंने तुम्हें अनचाहे ही
इस सब में खींचा था, ल्याल्यूशा, मगर तुम भी तो कहती हो कि ‘वे’ मुझे तोड़ने की
हिम्मत न कर सके. उनके हिसाब से, पाँच साल क्या होते हैं, अगर ‘वे’ दशकों में ही
गिनते हैं! और उन्होंने मुझे सज़ा दी – तुम्हें क़ैद करके, मगर ख़ुदा ने सब ठीक कर
दिया!”
इन अद्भुत क्षणों में बी.एल. ने जो कुछ भी
मुझसे कहा वह सब मैं वैसा का वैसा दुहरा नहीं सकती. वह ‘दुनिया को उलट-पलट’ कर
देने को तैयार था, ‘दोनों तरह की दुनिया को चूमना चाहता था.”
यह महसूस करके मुझे ख़ुशी होती थी कि वो
मेरे बारे में परिवार के एक अंश की तरह विचार करता है, और मैं महसूस कर रही थी कि
कैसे मेरे और मेरे अपनों की आर्थिक ज़िम्मेदारी उसे प्रेरित कर रही है, ऊपर उठा रही
है. मुझसे बिदा लेते हुए अक्सर वह दुहराता – ओल्यूशा, मैं तुम्हारे पास से सिर्फ
काम करने के लिए ही जाता हूँ. और अगर दिन में अच्छा सृजनात्मक काम हो जाता तो मेरे
कमरे में इस तरह वापस लौटता, जैसे कोई त्यौहार मनाने आया हो – और हम दोनों ख़ुश
होते, और, ऐसा लगता कि ज़िन्दगी में कोई मुश्किलें हैं ही नहीं...
मगर साथ ही ये भी याद दिलाते कि हमें जल्दी
नहीं मचाना चाहिए, सब कुछ अपने आप हो जाएगा, जैसे कि ‘नोवी मीर’ वाली मुलाक़ात हुई थी.
“तुम
मेरे लिए बसंत का उपहार हो, मेरी आत्मा, ख़ुदा ने कितना अच्छा किया जो तुम्हें बच्ची
बनाया...”
“ओल्यूशेन्का,
यह सब ज़िन्दगी भर ऐसा ही रहने दो – हम एक दूसरे की ओर उड़े चले आते हैं, और हमारे इस
मिलन के अलावा कोई और चीज़ ज़रूरी नहीं है...! हमें किसी और चीज़ की ज़रूरत भी नहीं है
– आगाह करने की, उलझनें पैदा करने की, किसी का अपमान करने की कोई ज़रूरत नहीं है...क्या
तुम इस औरत की जगह पर होना पसन्द करोगी? कई
सालों से हम एक दूसरे की बात भी नहीं सुन रहे हैं...और बेशक, उस पर सिर्फ दया की जा
सकती है – वह पूरी ज़िन्दगी बहरी ही रही – बेकार ही कबूतर उसकी खिड़की पे चोंच मारता
रहा...और अब वह इस बात पर क्रोधित है, कि मुझे सच्चा प्यार मिल गया है – मगर कितनी
देर से!”
इन पलों में हमारे सारे झगड़े लुप्त हो जाते.
अफ़सोस, कि मेरी स्त्री-सुलभ शिकायतें कभी-कभी वापस लौट आतीं.
उस समय, जब मैं अपने आप को भाग्यवान महसूस
कर रही थी, मेरे आस पास रहने वाले मुझ पर तरस खाते, मेरी निंदा करते, और ये सब बड़ा
निराशाजनक था...शायद मुझे उम्मीद थी जलन की, मान्यता की. मम्मा ने आख़िरकार मुझे मेरे
हाल पर छोड़ दिया.
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