रविवार, 24 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.4


1.4
“मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते...”

सन् 1947 आ पहुँचा. चार जनवरी को मुझे चिट्ठी मिली:
 “एक बार फिर से हार्दिक शुभकामनाएँ. दूर से ही मुझे शुभकामनाएँ दीजिए (कल्पना में) कि मैं जल्दी से “हैम्लेट”  और “1905” को दुहरा सकूँ और उसमें सुधार करने के बाद फिर से अपना काम शुरू कर सकूँ.
आप बेहद ख़ूबसूरत हैं, और मेरी ख़्वाहिश है कि आप ख़ुश रहें.
बी.एल.”
बोरिस पास्तरनाक की पहली चिट्ठी – रेखाओं पर उड़ते हुए सारस – वे पहली बार उड़कर मेरे पास आए थे...मगर उनके पंखों में कुछ ठण्डापन था: मेरे अंतर्मन से मैं कुछ और की भी अपेक्षा कर रही थी, कुछ ज़्यादा गर्मजोशी से भरे शब्दों की, संदेह में डाल रहा था : “काम शुरू कर सकूँ...” जैसे मुझे दूर ठेला जा  रहा हो, मुझ पर प्रतिबन्ध?...     
नए साल की मेज़ पर मेरे साथ थे बच्चे, मम्मा, दिमित्री इवानोविच...और यह चिट्ठी.
इस बीच संपादक दफ़्तर में कुछ मुश्किलें शुरू हो गईं. हाल ही में कंसंट्रेशन कैम्प से लौटे ज़ाबोलोत्स्की की कविताओं की पैरवी मैंने इतनी ज़्यादा हिम्मत से की, जितनी मुझसे उम्मीद नहीं थी. इसके अलावा, पत्रिका के लिए सीमोनोव द्वारा सोचे गए नए स्तम्भ, ‘साहित्यिक पल’ के न बन पाने के कारण उसके सहायक – क्रीवित्स्की के साथ कई बार मेरी झड़प भी हो गई थी. इस स्तम्भ के अंतर्गत समकालीन कवियों को ‘उसी पल’ लिखी गई कविताएँ देनी होती थीं.
मुझे याद है कि बी.एल. अपनी कविता “शीत ऋतु की शाम” लाए थे (श्वेत रंग है वसुंधरा पर...). यह कविता जब हम मारिया विन्यामिनोव्ना यूदिना के घर गए थे, उसके बाद लिखी गई थी. मुझे याद है कि मुझे और लीदिया कोर्नेयेव्स्काया चुकोव्स्काया (वह ‘नोवी मीर’ में साहित्यिक सलाहकार थी) को बहुत गुस्सा आया था: सीमोनोव ने पास्तरनाक को छापने का वादा किया था, मगर नहीं छापा, और, संपादक के कैबिन में घबराहट से घूमते हुए, ये यक़ीन दिला रहा था कि “शीत ऋतु की शाम” के लिए अपनी ज़िन्दगी के पाँच साल दे देता. मगर फिर भी उसने यह कविता नहीं छापी, और वो स्तम्भ भी बिखर गया. मगर “शीत ऋतु की” वो शमा, कई-कई बार, सीमोनोव की उस समय की कविताओं में जलती रही.
संपादकीय दफ्तर में उत्पन्न कठिनाईयों के बारे में मुझे बी. एल. को बताना पड़ा. वहाँ लोग समझ गए थे कि बी.एल. के साथ मेरा रिश्ता उस हद को पार कर चुका है जो संपादकीय दफ्तर के कर्मचारी और वहाँ आने वाले लेखक के बीच होता है. क्रीवित्स्की ज़हरीली मुस्कान से फ़ब्तियाँ कसता: “मुझे हैरानी होती है, कि पास्तरनाक के साथ आपकी नज़दीकियों का क्या हश्र होगा?” इसके अलावा, वो ख़ुद भी मेरे नज़दीक आने की कोशिश कर रहा था, संपादकीय दफ़्तर की अन्य महिलाओं के साथ भी वह इसी तरह पेश आता था.
जब मैंने परेशान होकर, और, हो सकता है, कुछ बढ़ाचढ़ाकर अपनी मुसीबतों के बारे में बी.एल. को बताया, तो उन्होंने उत्तेजित होकर कहा: “आपको फ़ौरन वहाँ से हट जाना चाहिए, आपकी देखभाल की ज़िम्मेदारी मैं उठाऊँगा.”
अगले दिन उन्होंने संपादकीय दफ़्तर में फोन किया और कुछ दयनीय स्वर में कहा: “मुझे तुरंत दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण बातों के बारे में आपसे कहना है. क्या आप फ़ौरन पूश्किन (पूश्किन का स्मारक – अनु.) के पास आ सकती हैं?”
जब मैं स्मारक के पास पहुँची, जहाँ हम अक्सर मिला करते थे, तो उत्तेजित बी.एल. घूम रहे थे.
और अचानक – अजीब सी, असाधारण आवाज़ में बोले:
 “अभी मेरी ओर न देखिए. मैं संक्षेप में आपसे अपनी प्रार्थना कहूँगा: मैं चाहता हूँ कि आप मुझे “तुम” कहें; क्योंकि “आप” अब झूठ हो गया है.”
 “मैं आपको “तुम” नहीं कह पाऊँगी, बोरिस लिओनीदोविच,” मैंने विनती की, “ये मेरे लिए असंभव है, अभी डर लगता है...”
 “नहीं, नहीं, नहीं, आपको आदत हो जाएगी, ठीक है अभी आप मुझे ‘तुम’ न कहिए, चलिए, मैं आपको “तुम” कहूँगा...”
मैं, बेहद परेशान, संपादकीय दफ़्तर में लौटी...महसूस कर रही थी कि कुछ और, बेहद महत्त्वपूर्ण, होने वाला है आज...बिल्कुल आज ही!”
शाम के क़रीब नौ बजे पोतापोव्स्की वाले मेरे घर में गरम पानी वाली बैटरी में जानी-पहचानी टक्-टक् हुई...
 “दूसरी बात तो मैंने तुमसे कही ही नहीं, तुम्हें दूसरी बात बताई ही नहीं,” – उत्तेजित, फुसफुसाती आवाज़ में बी.एल. ने कहा – “और तुमने भी यह जानने में दिलचस्पी नहीं दिखाई कि मैं क्या कहना चाह रहा था. मुझे कहना होगा. तो, पहली बात ये थी कि हमें “तुम’ पर उतरना होगा, और दूसरी, मैं तुमसे प्या-र- करता हूँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ, और मेरे लिए अब यही ज़िन्दगी है. कल मैं संपादकीय दफ़्तर में नहीं आऊँगा, बल्कि तुम्हारे कम्पाऊण्ड की तरफ आऊँगा, तुम उतर कर मेरे पास आना और हम मॉस्को में भटकेंगे.”
मैं घर लौटी और अपनी समूची पीड़ा से, पूरी ईमानदारी से और अपने प्रति निर्ममता से बी.एल. को पत्र लिखा. ये ख़त नहीं, बल्कि स्वीकारोक्ति थी – एक पूरी स्कूली-नोटबुक.
मैंने लिखा कि मेरे पहले पति एमेल्यानोव ने मेरे कारण फाँसी लगा ली; मैंने उसके प्रतिस्पर्धी और दुश्मन विनोग्रादोव से शादी कर ली; विनोग्रादोव के बारे में कई अफ़वाहें फैली थीं. वो काफ़ी सम्मोहक किस्म का और उदार इन्सान था, मगर कुछ लोग ऐसे थे जो इस बात का दावा करते थे कि उसीने मेरी माँ के ख़िलाफ़ शिकायत लिखी थी कि उसने अपने फ्लैट में “लीडर की निंदा” की थी, और मेरी बेचारी मम्मा को तीन साल कैम्प में गुज़ारने पड़े, युद्ध के सबसे भयानक और भुखमरी के सालों में. मगर मैं उसके साथ ही रही (हमारा एक बेटा था, और ईरा से भी वह पिता की ही तरह बर्ताव करता था) और सिर्फ उसकी मौत ने ही इस भयावहता का अंत किया. (सिर्फ उसकी मृत्यु के बाद ही मैं अपनी मम्मा को ढूंढ़ने निकल सकी, बिना टिकट के, फ़ौजी के ग्रेट-कोट में, उस भयानक स्टेशन ‘सूखो-बेज़वोद्नोए’ (सूखा-निर्जल-अनु.) पहुँची, ब्लड-डोनर के रूप में मुझे मिलने वाला स्पेशल राशन उसके लिए ले गई, और उसे वहाँ से निकालने में भी कामयाब हो गई. अपंग और बीमार लोगों को वहाँ से निकालने के कानून का इंतज़ार किया, उन दिनों ये संभव था, और ग़ैरकानूनी तरीक़े से अधमरी मम्मा को मॉस्को ले आई. ज़िन्दगी में काफ़ी कुछ भयानक था. मौतें, आत्महत्याएँ...)”
 “अगर आप,” (मैंने फिर भी ‘आप’ ही लिखा था), आँसुओं की वजह बने थे, तो मैं भी बनी थी! अब आप ही फैसला कीजिए कि आपके “तुमसे प्यार करता हूँ” का, मेरी ज़िन्दगी के इस सबसे बड़े सुख का, क्या जवाब दूँ...”  
अगले दिन मैं नीचे उतरी; बी.एल. हमारे कम्पाऊण्ड के सूखे फ़व्वारे के पास मेरा इंतज़ार कर रहे थे. यहाँ एक मज़ेदार बात हुई. उत्सुकतावश मेरी मम्मा सीढ़ियों वाली खिड़की के पास आई और इतना झुककर देखने लगी कि जब मैं उतरकर बी.एल. के पास आई तो वो बड़े आश्चर्यचकित और उत्तेजित लग रहे थे: “कोई औरत खिड़की से बस गिरते-गिरते बची.”
हमारी मुलाक़ात बहुत संक्षिप्त रही: बी.एल. मेरी नोट-बुक पढ़ने का इंतज़ार न कर सके.
रात साढ़े ग्यारह बजे टक्-टक् की आवाज़ सुनकर मैं फिर से नीचे वाले फ्लैट में उतरी. ओल्गा निकोलायेव्ना के कटु शब्दों ने मेरा स्वागत किया, “ल्युसेन्का, मैंने, बेशक, आपको बुला तो लिया, मगर वाक़ई में बहुत रात हो चुकी है और मिख़ाईल व्लादिमीरोविच सो चुके हैं.”
मुझे बेहद अटपटा लग रहा था, मगर मैं बी.एल. से यह कहने का फ़ैसला न कर सकी कि इतनी रात को फ़ोन न किया करें. उनकी आवाज़ ने मुझे इस सबके ऐवज़ में तोहफ़ा दे दिया, “ ओल्युशा, मैं तुमसे प्यार करता हूँ; आजकल शाम को मैं अकेले रहने की कोशिश करता हूँ और अपनी कल्पना में देखता हूँ कि तुम कैसे संपादकीय दफ़्तर में बैठी हो, न जाने क्यों वहाँ चूहे भाग रहे हैं, कैसे तुम अपने बच्चों के बारे में सोच रही हो. तुम लड़खड़ाते हुए मेरी किस्मत में आई हो. ये नोट-बुक हमेशा मेरे पास रहेगी, मगर तुम्हें मेरे लिए इसकी हिफ़ाज़त करनी होगी, क्योंकि मैं इसे घर में नहीं रख सकता, उसे ढूंढ़ सकते हैं.”
और मैंने वह स्वीकारोक्ति वाली नोट-बुक हिफ़ाज़त से रख दी. दो साल बाद वह एम.जी.बी.(मॉस्को सुरक्षा ब्यूरो) के पूछताछकर्ता के हाथ लग गई.
इस तरह मैंने और बी.एल. ने वो सीमा पार कर ली जिसके बाद हमें हर चीज़ अधूरी लगती, और बस एक ही बात बची थी: एक हो जाना. मगर इस रास्ते पर रुकावटें थीं, लगता था कि वे दूर ही नहीं होंगी.
ये समय था मॉस्को की अंधेरी गलियों और सड़कों पर अंतहीन क़ैफ़ियतों का, भटकनों का. कई बार हम एक दूसरे से जुदा हुए फिर कभी न मिलने के लिए, मगर मिले बिना रह न सके.
मैं रहती थी मम्मा के साथ, उसके पति द्मित्री इवानोविच कोस्त्को के साथ और अपने दो बच्चों के साथ, जिनके पिता अलग अलग थे. दोनों ही कब के गुज़र चुके थे. युद्ध के कारण मेरे बच्चे वास्तविक बचपन से महरूम रह जाते, अगर द्मित्री इवानोविच पिता की तरह उनकी देखभाल न करते. मगर फिर भी बच्चों को अपने अनाथ होने का एहसास था, ख़ासकर बड़ी ईरीना को.
आख़िर वो दिन आया जब बोरिस पास्तरनाक पहली बार मेरे बच्चों के सामने आए. मुझे याद है कि कैसे अपना पतला हाथ मेज़ पर टिकाकर ईरोच्का ने उन्हें कविता सुनाई थी. पता नहीं ये मुश्किल कविता उसने कब याद की थी.
व्यस्त हो तुम अपनी बैलेन्स-शीट में,
सु.कौ.पी.ए.* की शोकांतिका में,
तुम, ओ गायक, फ्लायिंग डचमैन से,
मनचाही कविता के सोपान पे.
तंबुओं का गंदला तूफ़ान,
उमड़ उठा उफ़नती द्वीना की तरह,
जब तुम, ओ, पंखधारी
प्रकट हुए मेरे साथ-साथ.
और तुम, पेट्रोल का बिल लिए?
परेशान और बदहवास मैं,
सोचता हूँ डॉक्टर के बारे में,
लौटा दे जो तुम्हें वापस तुम्हारा आवेश.
मालूम है मुझे, तुम्हारी राह है अनूठी,
मगर कैसे आओगे तुम,
इन पंगुओं के दड़बे से,
इस सच्ची राह पर?
* सु.कौ.पी.ए. (सुप्रीम कौंसिल ऑफ पीपल्स एकोनोमी. जन-अर्थव्यवस्था की उच्चतम कौंसिल.)  
बी.एल. ने एक आँसू पोंछा और ईरिन्का को चूम लिया.  “कैसी गज़ब की हैं इसकी आँखें! ईरोच्का, मेरी तरफ देखो! बिल्कुल ऐसे ही तुम, सीधे मेरे उपन्यास में आ गई हो!”
डॉक्टर झिवागो में लारा की बेटी कातेन्का का वर्णन – ये मेरी ही बेटी का वर्णन है:
 “कमरे में क़रीब आठ साल की लड़की आई दो पतली-पतली चोटियों वाली. पतली-पतली, कोनों तक जाती आँखों में चालाकी का भाव प्रतीत होता था. जब वह हँसती तो उन्हें कुछ ऊपर उठा लेती.”
मगर अपने परिवार के प्रति दया और दुहरी ज़िन्दगी का बोझ बोरिस लिओनीदोविच का दम घोंटने लगते – क्या किया जाए. वो बार बार मुझसे कहते कि अपने फ्लैट में प्रवेश करते हुए, जहाँ बुढ़ाती बीबी उसका इंतज़ार कर रही होती, वो अचानक उसमें रेड राईडिंग हुड को देखने लगते, जो जंगल में रास्ता भूल गई थी, और तलाक़ के लिए सोचे गए शब्द गले में ही अटक कर रह जाते. मगर वो मुझे यक़ीन दिलाते कि पत्नी के प्रति उदासीनता के लिए, बल्कि उसके कठोर चरित्र और खनखनाती आवाज़ से डर के लिए, मैं ज़रा भी दोषी नहीं हूँ. “वह पुलिस-कर्नल के परिवार से है”, गहरी साँस लेते हुए बी.एल. ने कहा. ये सब तो मुझसे मुलाक़ात होने के काफ़ी पहले से ही शुरू हो गया था. ये सब बड़ा अटपटा लगता है.  “ये किस्मत का ही खेल था,” उन्होंने कहा, “ज़िनाईदा निकोलायेव्ना से संबंध के पहले ही साल में मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया – असल में मैं उसे नहीं बल्कि गारिक को पसन्द करता था, (उसके पहले पति – गेन्रिख गुस्तावोविच नैगाऊज़ – का ज़िक्र उन्होंने इसी नाम से किया था) – जिसके पियानो वादन ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. “
 “और जब ज़ीना उसे छोड़कर मेरे पास चली आई तो वह, सनकी आदमी, मुझे जान से मारने चला था! मगर बाद में उसने इसके लिए मुझे बहुत धन्यवाद दिया!”
ये थे – वास्तविक बी.एल. हो सकता है - वो पियानो-वादन से सम्मोहित हो गए, और उस स्वर्गीय सुख की अनुभूति के पल में उन्हें महसूस हुआ हो कि ऐसी स्थिति सिर्फ किसी औरत के लिए गहरे प्यार के कारण उत्पन्न हुई है.
और, दो परिवार टूट गए, बड़ी मुश्किल से वो अपनी पहली पत्नी येव्गेनिया व्लादीमिरोव्ना और नन्हे बेटे से अलग हुए और ज़िनाईदा निकोलायेव्ना नैगाऊज़ से जुड़ गए. कहते हैं कि जल्दी ही अपनी गलती समझ गए. और “इस नरक में” रहते हुए दस साल से ज़्यादा हो गए हैं. ये सब इतने तनाव से कहा गया था कि उन पर विश्वास न करने का सवाल ही नहीं उठता था.  और मैं भी तो विश्वास करना चाहती थी!           
तीन अप्रैल सन सैंतालीस को रात बारह बजे तक मेरे नन्हे से कमरे में हम कैफ़ियत देते रहे, प्रसन्नता से नैराश्य के बीच गोते लगाते रहे.
जुदा होना बहुत कष्टदायक था: बी.एल. ने कहा कि उन्हें प्यार करने का कोई हक़ नहीं है, कोई भी अच्छी चीज़ अब उनके लिए नहीं बची, उन पर ज़िम्मेदारियाँ हैं और मुझे उन्हें जीवन के परिचित ढर्रे से और – काम से भी, विचलित नहीं करना चाहिए, मगर फिर भी ज़िन्दगी भर वह मेरा ध्यान रखेंगे.
रात भर मैं सो नहीं सकी. एक एक मिनट बाद मैं बालकनी में भागती, सुबह की आहट को सुनती रही, पोतापोव स्ट्रीट के छोटे-छोटे लाईम-ट्रीज़ के नीचे स्ट्रीट-लैम्प्स को बुझते हुए देखती रही...
बाद में इनके बारे में लिखा गया था:
स्ट्रीट लैम्प्स की धुंधली तितलियों ने,
छुआ सुबह को पहली थरथराहट से...
और सुबह छह बजे – घंटी बजी. दरवाज़े के सामने – बी.एल.. पता चला कि वह पैदल-पैदल अपनी समर कॉटेज गए और वापस आए, पूरी रात शहर में घूमते रहे...
हमने ख़ामोशी से एक दूसरे का आलिंगन किया...
वो शुक्रवार का दिन था, चार अप्रैल सन् सैंतालीस. मम्मा अपने पति और मेरे बच्चों के साथ दिन भर के लिए पोक्रोव्स्कोए-स्त्रेश्नेवो घूमने चली गई.
और, जैसे नवविवाहित जोड़े अपनी पहली रात मनाते हैं, उसी तरह हमने ये अपना पहला दिन मनाया. मैंने उनकी सिलवटों वाली पतलून पर इस्त्री की. वे अपनी सफ़लता से बड़े उत्साहित और प्रसन्न थे. वाक़ई में “ऐसी शादियाँ भी होती हैं जो, पति और पत्नी से भी ज़्यादा रहस्यमय होती हैं.”
कितनी साफ़गोई से, और अपनी आत्मा तथा चरित्र की सादगी से बाद में उन्होंने लिखा और कहा था:
 “भावनाओं के अधिकारों और ज़रूरतों  की ही तरह ‘स्वच्छन्द प्रेम’ का विचार  भी मेरे लिए अपरिचित है. ऐसी चीज़ों के बारे में सोचना और बात करना उसके लिए ओछा काम था. अपनी ज़िन्दगी में उसने कभी गुलछर्रे‘ नहीं उड़ाए, अपने आप को कभी अर्ध-ईश्वरों और अतिमानवों की श्रेणी में नहीं रखा, अपने लिए कभी विशेषाधिकारों और सुविधाओं की मांग नहीं की.” (डॉक्टर झिवागो, 1954).
 “मैं नैतिकता के प्रश्नों का निर्णायक नहीं हूँ, और न ही उसके विभिन्न रूपों का विरोधक...  ‘भावनाओं के अधिकारों’ के बारे में, ‘स्वच्छन्द प्रेम’ के बारे में और मनुष्य की निकटता के विभिन्न रूपों के बारे में फ़लसफ़ा बघारने की कल्पना से ही मुझे मतली होने लगती है.” ( 7.5.58 को रेनाटे श्वैत्सर को लिखे पत्र से).                     
 “मैं किसी भी तरह के नियमों के ख़िलाफ़ हूँ – क्या ‘दोमोस्त्रोय’ में वर्णित आधार पर गठित परिवार होना चाहिए, या स्वच्छन्द प्रेम – हर हालत में अलग-अलग संभावनाएँ हो सकती हैं. किन्हीं नियमों की ज़रूरत नहीं है, ज़िन्दगी ख़ुद ही ज़रूरत के मुताबिक फ़ैसला कर लेगी. ..” (2.11.59 को एक महिला को दी गई मुलाक़ात से).
 और, अभी हाल ही में:
 “... जीनियस और सुन्दरी : ये  शब्द कब के एक समान ओछे हो गए हैं. और उनमें समानता क्या है...कुछ परिपूर्ण सा ‘मैं – तुम हो’ उन्हें दुनिया में सभी संभावित संबंधों द्वारा जोड़ता है और गर्व से, उत्साह से, और थकावट से उनकी आकृतियों को एक ही मेडल से जड़ देता है.”
इस ख़ुशनुमा दिन की सुबह बी.एल. ने अपनी कविताओं की लाल पुस्तिका पर लिखा:
 “मेरी ज़िन्दगी, मेरे फ़रिश्ते, ओह, कितना प्यार करता हूँ मैं तुझसे.
                         4 अप्रैल. 1947”
इस लाल पुस्तिका की भी अपना ही किस्सा है. सन् ’49 में, मेरी पहली गिरफ़्तारी के समय मुझसे वे सारी किताबें छीन ली गईं, जो बोर्‍या ने मुझे भेंट दी थीं. और जब पूछताछ ख़त्म हो गई और मुँहासों वाले नौजवान लेफ्टिनेंट की ‘त्रोयका’ ने मुझे सज़ा सुना दी – तो बोर्‍या को लुब्यान्का बुलाकर मेरी किताबें सौंप दी गईं – और उसने वो पन्ना फाड़ दिया.  फिर एक दूसरी सुबह, जब मैं कैम्प से लौट आई थी और हम फिर से सुखी थे, बल्कि पहले से ज़्यादा ख़ुश – मैंने बोर्‍या को ताना दे ही दिया – वो ऐसा कैसे कर सका? अब कवर-पेज के पीछे की ओर उसके हाथ से लिखा था: “मैंने वो लिखावट वाला पन्ना फाड़ दिया, जब उसे घर लाया था. तुम्हें उसकी क्या ज़रूरत है?”
ख़ामोशी से मैंने यह पढ़ा और अपनी ओर से नीचे लिख दिया: “कहने को कुछ बचा ही नहीं है, अच्छा किया: अगर न फ़ाड़ा होता तो ये किताब ख़ुशी के दिनों की यादगार बन जाती – मगर अब है – दुर्भाग्य की, विनाश की! हाँ!”


तब बोर्‍या ने अपनी तस्वीर निकाली, जो वो साथ में लाया था, उसके पीछे 1947 में लिखी इबारत का एक एक अक्षर दुहराया, और उसके नीचे वही तारीख डाली और उसके नीचे लिखा: “ये इबारत अमर है और हमेशा के लिए वैध है. और वह सिर्फ बड़ी ही होती जाएगी.” मगर ये लिखा था सन् 1953 में.

रविवार, 17 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.3

1.3
....बेचैन ख़ुदा

मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सन् 1946 की ओर लौटती हूँ.
संपादकीय ऑफ़िस में ख़ुदा से मुलाक़ात के दूसरे दिन मैं संपादक मंडल की मीटिंग से हमारे लाल कमरे में हमेशा की अपेक्षा काफ़ी देर से लौटी. ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने, जो प्रवेश द्वार के पास अपनी सचिव वाली कुर्सी पर बैठी थी, कहा:
 “आपका प्रशंसक यहाँ आया था, देखिए वो आपके लिए क्या छोड़ गया है.”
मेज़ पर अख़बारी कागज़ में लिपटा हुआ पैकेट पड़ा था: कविताओं और अनुवादों की पाँच छोटी-छोटी किताबें.
फिर तो हर चीज़ ख़तरनाक तूफ़ान की गति से बढ़ती गई. बोरिस लिओनीदोविच लगभग हर रोज़ मुझे फोन करते, और मैं, अपने अंतर्मन में उनसे मिलने और बात करने से घबराते हुए, ख़ुशी से सन्न, बेतरतीब सा जवाब देती: “आज मैं व्यस्त हूँ”. मगर लगभग हर रोज़ दफ़्तर का समय ख़त्म होते होते वो ख़ुद संपादकीय दफ़्तर में प्रकट हो जाते और अक्सर हम लोग गलियों से, राजमार्ग से, स्क्वेयर्स से होते हुए पैदल- पैदल पोतापोव्स्काया मार्ग तक आते.
 “अगर आप चाहें तो मैं आपको ये स्क्वेयर तोहफ़े में दे दूँ? नहीं चाहतीं?” मैं, बेशक, चाहती.
एक बार उन्होंने संपाद्कीय दफ़्तर में फोन किया और कहा:
 “क्या आप मुझे अपना कोई और टेलिफोन नंबर दे सकतीं हैं, मतलब, किसी पड़ोसी का, मेरा दिल आपसे सिर्फ दिन में ही नहीं, शाम को भी बातें करना चाहता है.”
ओल्गा निकोलायेव्ना वोल्कोवाया का टेलिफोन नंबर देना पड़ा, जो हमारे फ्लैट से एक मंज़िल नीचे रहती थी. पहले मैंने ऐसा कभी नहीं किया था.
और फिर शाम को गरम पानी के पाईप पर टक्-टक् होने लगी – मुझे मालूम हो जाता कि ये निचली मंज़िल के फ्लैट से ओल्गा निकोलायेव्ना मुझे बुला रही है.
बी.एल. (बोरिस लिओनीदोविच – अनु.) किन्हीं गूढ़ विषयों से एक अंतहीन बात शुरू करते. कुछ चालाकी से, जैसे बातों-बातों में वो दुहराते: “अपने फूहड़पन के बावजूद, मैं कई बार औरतों को रुलाने का कारण बना हूँ...”
और अब, ऐसा लगा, जैसे वो फिर से पुराने इतिहास से गुज़र रहे हैं, जब उन्हें किसी मैडम वी. के ट्यूटर के रूप में काम करना पड़ा था. इस किस्से का वर्णन “सुरक्षित दस्तावेज़” में किया गया है. न जाने क्यों, मैं उनकी पहली प्रेमिका की याद दिलाती थी. उसे “बालों की कंघी से पैरों तक” वह “”शेक्सपियर के नाटक की तरह” “मुँहज़बानी” जानते थे. उसने इनकार कर दिया. और उसके इनकार ने मेरे प्रीतम को सिसकते हुए कहने पर मजबूर किया:
(कितनी सुन्दर हो तुम!) – ये दमघोंटू बवण्डर –
क्या कह रहे हो? होश में आओ! ख़त्म हो गया. ठुकरा दिया.”
वी. के रिश्तेदारों को नौजवान कवि की अस्थिर ज़िन्दगी से परहेज़ था और उन्होंने वी. को इनकार करने पर मजबूर कर दिया. कहते हैं – वो भयानक ग़रीबी में मरी.
“मैं नहीं चाहता कि तुम्हें कभी मेरी वजह से रोना पड़े. मगर हमारी मुलाक़ात बेकार नहीं जाएगी – न तुम्हारे लिए, न मेरे लिए.”
घर पहुँचकर मैंने बी.एल. को कविता लिखी:
पहले दिन से अधमुँदी पलकों को,
मुश्किल से खोला ही था मैंने,
और जिसने – प्यार नहीं था किया तुमको
आ गई मुझसे बाँटने...
टेलिफोन के तार, गुज़रते हैं
तुम्हारे और मेरे ऊपर से
गुज़र गई तूफ़ान की तरह तेरी जवानी
ख़ुदा में विश्वास न करते देश के ऊपर से...
और इसी तरह का कुछ और.
आधे मॉस्को से गुज़रती इन लम्बी सैरों के दौरान हमारी बातचीत काफ़ी गड्ड्-मड्ड् होती थी और उसको लिख कर रखना असंभव था. बी.एल. को अपने दिल का “बोझ हल्का करना” होता था और, मैं बस घर पहुँचती ही थी कि गर्म पानी वाले धातु के पाईप से खट्-खट् की आवाज़ आने लगती. मैं, सिर धुनते हुए, फिर से निचली मंज़िल पर अधूरी बातचीत की तरफ़ भागती, और बच्चे विस्मय से मेरी ओर देखते रहते.
जल्दी ही “नोवी मीर” में एक जवान, प्यारी, अपरिचित ज़नाना आवाज़ ने मुझे फोन किया. ये ल्यूस्या पोपोवा थी जो बोरिस लिओनीदोविच के कहने पर फोन कर रही थी. जल्दी ही वह मुझसे मिलने घर पर आई. छोटी सी, भूरे बालों वाली गुड़िया, उसका चेहरा लिओनार्दो की परी जैसा था. ये ड्रामा-इन्स्टीट्यूट के एक्टिंग विभाग की विद्यार्थिनी थी, जो बाद में पेंटर बन गई. सन् 1944 में पॉलिटेक्निक-म्यूज़ियम में हुई काव्य-संध्या के बाद वह निर्गम-द्वार के पास पास्तरनाक का इंतज़ार कर रही थी, और जैसे ही वो बाहर निकले उनके पास अपना परिचय देने के लिए गई. मगर अपने ही साहस से वह इतना घबरा गई, इतनी गड़बड़ा गई कि कुछ-कुछ अनाप-शनाप कहने लगी. बी.एल. ने अपने बेटे से उसका परिचय करवाया और हौसला देती मुस्कुराहट से (जैसे वह ख़ुद ही कुछ भी कहने में असमर्थ हैं, न कि लड़की) कहा: “मैं थक गया हूँ और आपकी किसी भी बात का जवाब नहीं दे सकता, मुझे माफ़ कीजिए. ये रहा मेरा टेलिफोन नंबर, मुझे फोन कर लीजिए, हम मिलकर बात करेंगे. गुड लक.” और जाते जाते मुड़ कर बोले, “फोन ज़रूर कीजिए, बेहतर है बुधवार को...”

और इसके बाद ल्यूस्या ने मुझे टेलिफोन करने की कहानी सुनाई:

 “एक बार मुझे बी.एल. का एक पोस्ट-कार्ड मिला: आ जाईये,” उन्होंने लिखा था, “मेरा आपसे मिलना बहुत ज़रूरी है.”

मैं उनके पास गई. उनका चेहरा ऐसा दमक रहा था, जैसे बर्थ-डे बॉय का होता है:

 “आप जानती हैं, ल्यूस्या,” उन्होंने दमकते हुए कहा, “मुझे प्यार हो गया है.”

 “अब आप की ज़िन्दगी का क्या होगा, बोरिस लिओनीदोविच?” मैंने ज़िनाईदा निकोलायेव्ना के चेहरे की कल्पना करते हुए पूछा.

 “ हाँ, ज़िन्दगी में रखा क्या है, क्या रखा है ज़िन्दगी में, अगर प्यार नहीं है तो?” उन्होंने जवाब दिया.  “और वो इतनी सम्मोहक है, वो इतनी ख़ुशनुमा है, इतनी सुनहरी है. अब मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश किया है इस सुनहरे सूरज ने, ये इतना अच्छा है, इतना अच्छा है. नहीं जानता था कि मैं अभी भी ऐसी ख़ुशी महसूस करूँगा. वो ‘नोवी मीर’ में काम करती है. मैं चाहता हूँ कि आप उसे फोन करें और उससे मिलें.”

 “बेशक, हम मिलेंगे,” मैंने दमकते बोरिस लिओनीदोविच से कहा.

और मैंने ‘नोवी मीर’ में फोन किया.

बुधवार, 13 अगस्त 2014

Novyi Mir - 1.2

1.2
कैसे होता है आरंभ कविता से जीने का

मेरी युवावस्था के दिनों में मेरे सहपाठी और समकालीन लोग पास्तरनाक के बेहद दीवाने थे. पास्तरनाक की कविता को पहली बार मेरे घर लाया था खोल्मिन. बसंत के रास्तों पर कितनी बार मैं घूमी हूँ उन सम्मोहित करते शब्दों को दुहराते हुए जो पूरी तरह मुझ तक न तो पहुँचे थे, न ही समझ में आए थे.
अपनी नीली आँखों को आधा मूँदे, येसेनिन जैसे सुनहरे बालों को जानबूझकर बिखेरते हुए खोल्मिन पास्तरनाक के संकलन “बहन मेरी ज़िन्दगी” और “बाधाओं से ऊपर” से कविताएँ सुनाता. मुझे ऐसा लगता था कि वो किसी और के उन्माद के प्रभाव में प्रलाप कर रहा है! और तब से दिमाग में रह गई है रात में भटकते हुए मुसाफ़िर की वह शोकपूर्ण स्वीकारोक्ति:
नहीं है ये वो शहर, ना ही है वो रात
भटक गया है तू, दूत उसका!

उस समय मैं कह नहीं पाती थी कि आधी बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है, मगर मंत्रमुग्ध सी खोल्मिन के मुँह की ओर देखती रहती. मगर अपनी संवेदना से मैं तभी से समझ गई थी कि ये ‘ख़ुदा’ के शब्द गूँज रहे हैं, सर्वशक्तिमान ‘तफ़सील के ख़ुदा’ के शब्द, सर्वशक्तिमान ‘प्यार के ख़ुदा’ के शब्द.
फिर हुई मेरी पहली दक्षिण की यात्रा, मेरी पहली यात्रा सागर की. खोल्मिन ने, जो मुझे छोड़ने आया था, मुझे पास्तरनाक के गद्य की छोटी सी किताब पकड़ा दी - हल्के गुलाबी-जामुनी रंग की, खुरदुरे कवर की लम्बी स्कूल-एक्सरसाईज़ बुक की शकल की. ये थी ‘ल्युवेर्स का बचपन’. ऊपर की बर्थ पर लेटे हुए, मैंने फिर से असाधारण तक पहुँचने के लिए संकेत-शब्द ढूँढ़ने की ज़िद्दी कोशिश की: एक मर्द किसी युवती की रहस्यमय दुनिया में इस तरह प्रवेश कैसे कर सका?
सोची के सेनिटोरियम में आने के बाद मैं अक्सर एकांत में इस आश्चर्यजनक किताब के साथ रहती थी. उस समय की अपनी बेवकूफ़ी भरी कविताओं में मैंने लिखा था: 
पास्तरनाक के गद्य के बादल
और मेरे सपने छाए हैं मेरी मेज़ पे...
.
मैं आज भी समझ नहीं सकती कि युवावस्था में ही इस अविश्वसनीय, क्लिष्ट आविष्कार की गहराई में पैंठने की मेरी इच्छा कैसे हुई. बस, मैं खिंचती गई.
युवावस्था से ही गुमिल्योव से बेहद प्रभावित, तब मैं पास्तरनाक के पास उनकी एक पंक्ति लेकर गई थी, जिसने मुझ पर जादू कर दिया था:
अद्भुत संदिग्धता की सौगात मिली है तुझे कवि...
फिर मुझे यक़ीन हो गया कि जब उनके अत्यंत कठिन काव्यात्मक प्रतीकों को समझने की ज़रा सी भी असमर्थता के कारण  उन्हें ‘संदिग्धता’ की श्रेणी में शामिल कर लिया जाता और बोरिस लिओनीदोविच को इसका दोष दिया जाता, तो वे बहुत गुस्सा हो जाते थे.
उनकी राय में, इन प्रतीकों की स्पष्टता और उनके बीच के संबंध के रहस्य को सिर्फ वही व्यक्ति महसूस नहीं कर सकता था जो कविता के प्रति बहरा हो, या फिर जिस पर साहित्यिक परंपराओं ने लगाम लगाई हो, पहली नज़र में बन्दी प्रतीत होते प्रतीकों और रूपकों को अपनी ही चाभी से आज़ाद करना जिसके बस के बाहर हो. और अगर वो उन्हें आज़ाद न कर पाता हो, तो अपनी इस असमर्थता को छुपाने के लिए, बेवजह ही चुगली करने वाले लेख न लिखे.      
कई अन्य लोगों की तरह मुझे भी उस अज्ञात का रहस्य सम्मोहित करता था, जो अब तक अनसुलझा और अप्राप्य था. काव्यात्मक प्रतीकों का भेद खोलने में सबसे बड़ी बाधा थी - पर्याप्त तैयारी का अभाव, और उन्हीं साहित्यिक परंपराओं का प्रभाव. मगर समस्या का समाधान आसपास ही मौजूद था : बसंत – कपड़ों की छोटी सी पोटली / “अस्पताल से छुट्टी पाए मरीज़ की”. बसंती वृक्षों की टहनियों पर चिपके मोम के शेष टुकड़े को – कलियों का नाम देना ज़रूरी नहीं है! और बिन-होठों की पत्ती, शिशिर की दूत, और बगीचे की स्तम्भों वाली रचना, जो आसमान को थामे हुए हो... – सब कुछ आश्चर्यजनक रूप से स्पष्ट था. हाँ, ये कोई जादू था, और चमत्कार भी, और हो सकता है महान कवि को प्रदत्त “संदिग्धता”. ऐसा लगता था जैसे तुम्हारे ही द्वारा अब तक ‘अज्ञात’ का आविष्कार होगा, जिसे ख़ुदा ने एक बन्द दरवाज़े के पीछे तुमसे छुपा कर रखा है. उन महान तोहफ़ों को लेने में हाथ अभी झिझक रहे हैं, कमज़ोर हैं, मगर महानता से देने वाले और नम्रता से लेने वाले के बीच का संबंध – स्थापित हो चुका था.                

पोतापोव्स्काया स्ट्रीट वाले मेरे छोटे से कमरे में इन ख़ूबसूरत जटिलताओं को समझने की दिशा में मेरे पहले क़दम बढ़ रहे थे. फिर आश्चर्यजनक रूप से सही और सरल उत्तर प्राप्त हो गए....

शनिवार, 9 अगस्त 2014

Part 1 - Novyi Mir - 1.1

भाग - 1

1.1
    
नोवी मीर*
* नोवी मीर (नई दुनिया) रूस की एक प्रमुख साहित्यिक पत्रिका है, जिसका आरंभ 1925 में हुआ था.    



मैं अपनी जीवनी नहीं लिखता.
उससे मुख़ातिब मैं तब होता हूँ
जब कोई और जीवनी उसकी मांग करती है.

बोरिस पास्तरनाक
 आह भरके, कहती हूँ अपने आपसे,
दोपहर की निर्मम चकाचौंध में:
मैं गुनहगार सही, बुरी ही सही,
मगर तुमने किया था मुझसे प्यार!




पूश्किन स्क्वेयर

सन् 1946 के अक्टूबर में ‘नोवी मीर’ का संपादकीय दफ़्तर ‘इज़्वेस्तिया’ की चौथी मंज़िल से पूश्किन स्क्वेयर के कोने वाली बिल्डिंग में शिफ़्ट हुआ. हमारे इस नये आवास में, हमारे वर्तमान स्वागत-कक्ष में, किसी ज़माने में आयोजित नृत्योत्सवों में नौजवान पूश्किन नृत्य किया करते थे.
तो, हम आ गए हैं नई जगह पर. हमारे यहाँ आने तक फ़ौलादी अलेक्सान्द्र पूश्किन को त्वेर्स्की राजमार्ग से नहीं घसीटा गया था और वह आधुनिकतावादी सिनेमा थियेटर ‘रसिया’ की पार्श्वभूमि में लुप्त नहीं हुआ था. काँच के इस महल का अस्तित्व तब था ही नहीं.
हमारे यहाँ आने के बाद न केवल खिड़कियों से दिखाई देने वाला नज़ारा बदल गया (अब हम स्क्वेयर के स्थान पर वर्जिन मैरी का चर्च देख सकते थे, जो अपने फूहड़, प्यारे-प्यारे पंजों से फुटपाथ पर चढ़ आया था), बल्कि हमारा प्रमुख संपादक भी बदल गया. रोएँदार, छैले जैसी कैप पहने, मोटी छड़ी का सहारा लिए नया संपादक अन्दर आया. श्चेर्बिना के नौसेनिकों वाले काले कोट की जगह पर सीमोनोव का अमेरिकन स्टाईल का फ़ैशनेबुल कोट लटकने लगा. नये संपादक की ऊँगलियों में बड़ी-बड़ी अँगूठियाँ थीं. शायद, उसकी पसन्द के अनुसार ही हॉल को गहरे लाल रंग में पेन्ट किया गया था, कॉर्निस सुनहरी थी. सीमोनोव – मॉस्को की सभी औरतों का सपना था, हर औरत यही समझती थी कि उसका प्रसिद्ध कविता-संग्रह ‘तेरे साथ और तेरे बिना’ उसीके लिए लिए लिखा गया है – ‘र’ का उच्चारण फ्रांसिसियों की तरह बड़ी ख़ूबसूरती से करता था, उसके बाल शानदार थे, ऊदबिलाव जैसे, जिन पर जल्दी ही चांदी झलकने लगी थी, ढीले-ढाले और फ़ैशनेबल अमेरिकन कोट पहनता, उसे मित्र देशों के प्रतिनिधियों का तथा युद्ध के मोर्चे पर कुछ समय पहले बने अपने दोस्तों का स्वागत करना अच्छा लगता था.
ये पहली बार था कि उसके लिए एक अलग, शानदार ऑफ़िस-कैबिन बनाया गया था, हम – उप संपादकों के लिए फ़िलहाल अपने-अपने अलग ऑफ़िस-कैबिन नहीं थे; मैं, नये लेखकों के विभाग की उप संपादक और मेरी सहेली, नताशा बिआन्की, पत्रिका की तकनीकी संपादक, हॉल के काफ़ी अन्दर एक दूसरे के पास बैठते थे. मेरे पास आने वाले नौजवान लेखक सकुचाते हुए पूरे हॉल को पार करके मेरी मेज़ तक पहुँचते थे. अक्सर, जब नताशा प्रिंटिंग-सेक्शन में नहीं भागती थी, बल्कि अपनी जगह पर होती, हमारे पास हमारे पुराने दोस्त आ जाते. ये पुरानी बिल्डिंग वाले दोस्त थे. ज़िन्दगी गुज़र रही थी, दोस्ती का, सहानुभूति का और लगाव का लेन-देन करते हुए.
यहाँ छोटे बच्चों वाले, आधे छपाई के अक्षरों में, अपनी कविता की कॉपी लाया था पतले चेहरे, सुनहरे–भूरे बालों वाला, नौजवान झेन्या एव्तुशेन्को. यहाँ प्रकट हुई थी गुलाबी-गुलाबी, भूरी आँखों वाली सुन्दरी, बेला अहमादुल्लिना. वह ग़ज़ब की ताज़गी से महकती थी, और अन्य रंगों की अपेक्षा उसे सैमन-गुलाबी रंग बेहद पसन्द था. मेरी मेज़ के पास बैठा करती थी वेरोनिका तूश्नोवा. उससे बढ़िया सेंट की मादक ख़ुशबू आती थी, और वह अपनी तराशी हुई पलकों को यूँ झुकाया करती मानो जीवित गालातेया हो. मेरी उससे पारिवारिक पहचान थी, उसके पहले पति – मनोचिकित्सक रोगिन्स्की ने मेरे दो साल के बेटे को मेनिंजाइटिस से बचाया था. आज तक मेरी पास उसकी तस्वीर है जिस पर लिखा है: “ मेरी प्यारी, भली, मुझे समझने वाली, अद्भुत दोस्त को सस्नेह. वेरोनिका.” उसके साथ मैं अपने सभी दुख-दर्द बाँटती थी.
ज़िन्दादिल और मनमौजी अन्तोकोल्स्की मानो उड़ता हुआ आता था, चिकने-चुपड़े बालों की तिरछी मांग बनाए ज़ाबोलोत्स्की आता था, जो उस कवि जैसा बिल्कुल नहीं था, जिसने अपने लेखन का आरंभ ‘राशि-चक्र के निशानों’ से किया था; यातना-कैम्प के बाद वह संजीदा हो गया था. अख़बारों में उसके बारे में हुए शोर-शरावे के बाद यहाँ आया था ज़ोशेन्को - क्रीम-कलर का रेनकोट पहने, विवर्ण मुख, आँखों के नीचे काले घेरे, सलीकेदार और नौजवानों जैसा सीधा. मुझे याद है कि सीमोनोव ने बाँहें फैलाकर उसका स्वागत किया था, मुझे डाँट भी पिलाई कि उसके आने की सूचना फ़ौरन क्यों न दी गई. नए प्रमुख संपादक की बहादुरी से हम कितने प्रभावित हो गए थे! बाद में पता चला कि इस ‘बहादुरी’ को ‘ऊपर’ से मंज़ूरी मिली थी.
बाद में, जब पास्तरनाक हमारे संपादन कार्यालय में आने लगे, तो एक दिन मेरी मेज़ पर उन्होंने फ्रांसीसी भाषा के अनुवादक यूरी शेर को देखा.
 “माय गॉड,” बोरिस लियोनीदोविच की आवाज़ गूँजी, “ये आदमी किस क़दर मुझे बेचारे मिखाईल मिखाईलोविच ज़ोशेन्को की याद दिला रहा है.” सबने नज़रें झुका लीं, मानो कुछ सुना ही न हो.
मेरा पुराना सहपाठी, साशा पीस्मेन्नी आया करता; नताशा का भावी पति, ईल्या फ्रेन्केल आता; मेरा बुज़ुर्ग दोस्त साशा श्पीर्त; मेरा और नताशा का पसन्दीदा कवि निकोलाय असानोव आया करता जो काफ़ी सलीके से कपड़े पहनात था और मेरी मेज़ पर गुलाबी फूल रखता.
अल्योशा नेदोगोनोव आया करता. वह बहुत नम्र और प्यारा था, और हम उसके साथ अक्सर मीठी वाईन, कागोर पीते जो वह पास ही की दवाई की दुकान से लाता था. कठोर चेहरे वाला लुकोनिन आता; भला, मिलनसार ओशानिन आता, वह थोड़ी देर बैठता और कविताएँ पढ़ता. उस समय उसे मेरे साहित्यिक प्रभाव पर काफ़ी भरोसा था - और हमारी पत्रिका, जो अपने मित्र बोरिस के बारे में लिखी उसकी कविता को प्रकाशित कर चुकी थी, ख़ुशी से उसकी नई कविताएँ भी स्वीकार कर लेती. मासूम, दलदली-मत्स्यकन्या की सरकण्डे के रंग जैसी आँखों वाला मेझिरोव आता भद्दे फ़ौजी जूते और ग्रेटकोट पहने. वह युद्ध से संबंधित सुन्दर कविताएँ पढ़ता – पहले-पहले हकलाते हुए, मगर फिर उनमें ऐसे कूद पड़ता जैसे पानी में कूद रहा हो, और आराम से तैरने लगता, बिना किसी रुकावट के. हमारे उस हॉल को सुशोभित करने वाली सभी प्रसिद्ध और सामान्य हस्तियों के नाम गिनाना तो संभव नहीं है. श्चेर्बिना के समय के कुछ लोग भी आते जैसे बोरिस सोलोव्येव, और ख़ास तौर से हम सब के प्यारे यान साशिन जिसकी आँखें औरतों की आँखों जैसी ख़ूबसूरत थीं. उसका दोस्त जो बोरियत की हद तक सलीकापसन्द था, रास्किन भी आता जिसके दिल में नताशा के प्रति स्पष्ट आकर्षण था.
ओसिप च्योर्नी, अंतोनोव्स्काया, मिखाल्कोव, सेर्गेई वासिल्येव, और अंत में द्मित्री सेदीख, जिसे भी मेरी ओर से काफ़ी साहित्यिक आशाएँ थीं. सिर्योझा वासिल्येव मुझे अक्सर बियर-बार में आमंत्रित करता जो स्त्रास्त्नाया रोड के नुक्कड पर खुली थी. वहाँ भी साहित्यिक योजनाओं पर विचार विमर्श होता. कविताओं के बारे में पूरे दिन बातें करते, कभी किसी के साथ तो कभी किसी और के साथ. ये वो चीज़ थी जिसमें आप पूरा दिमाग़ झोंक देते हो. ये युद्धोपरांत का आधा-भूखा, मगर जवान और ख़ुशनुमा समय था. काफ़ी कुछ अभी तक अनावृत्त नहीं हुआ था, कई उम्मीदें ऐसी थीं जो बुझी नहीं थीं. सिमोनोव ने पहले-पहल विद्यमान उत्कृष्ट लेखकों को आकर्षित करना चाहा, जैसे कि अन्तोकोल्स्की, पास्तरनाक, चूकोव्स्की, मार्शक. पास्तरनाक से व्यक्तिगत परिचय के लिए मैं सीमोनोव की आभारी हूँ.                            
सीमोनोव के कार्यकाल के आरंभ में हमारे संपादन-गृह की सचिव ज़िनाईदा निकोलायेव्ना पिद्दूब्नाया ने, मुझे एक तोहफ़ा दिया. यह एक अधेड़ महिला थी, जिसकी भूतपूर्व सुन्दरता में से केवल लम्बी, काली आँखें और लम्बी गर्दन ही सलामत बचे थे, जिसके कारण हमने बदतमीज़ी से उसका नाम साँप रख दिया था. तोहफ़ा था – ऐतिहासिक म्यूज़ियम की लाइब्रेरी में ‘पास्तरनाक के साथ एक शाम’ का टिकट. वे अपने अनुवादों का पाठ करने वाले थे. मैंने युद्ध के पहले से ही उन्हें नहीं देखा था. याद है कि आधी रात के बाद, जब मैं घर वापस लौटी तो गुस्से से बड़बड़ाती हुई माँ को, जिसे मुझे दरवाज़ा खोलने के लिए उठना पड़ा था, मैंने कहा था:
 “मैं अभी-अभी ख़ुदा से बातें करके आई हूँ, मुझे परेशान मत करो!” उसने हाथ झटक दिया और सोने चली गई.
 सुबह, मुझे याद है, कि मैं नताशा के पास यह बताने के लिए गई. मगर उसका ‘मूड’ नहीं था और उसने कुछ चुभती हुई टिप्पणियाँ कीं. वो अक्सर हमारे इस कविता-प्रेम की हँसी उड़ाया करती थी. लाइब्रेरी वाली शाम को अपने ही दिल में दुहराना पड़ा. पहली बार मैंने पास्तरनाक को इतने नज़दीक से देखा था.
ख़ूबसूरत कदकाठी, दिखने में आश्चर्यजनक रूप से जवान, गहरी, नीची आवाज़, मज़बूत, जवान गर्दन, श्रोताओं से इस तरह मुख़ातिब हो रहे थे जैसे किसी घनिष्ठ मित्र से बात कर रहे हों और पढ़ इस तरह रहे थे जैसे अपने आप को या अपने घनिष्ठ मित्र को सुना रहे हों, बुदबुदाते हुए, फिर से उन्हें दुहराते हुए. कुछ गिनेचुने ख़ुशनसीब लोगों ने अंतराल में उनसे विनती की कि वे अपनी कोई रचना सुनाएँ, मगर उन्होंने मना कर दिया, अपनी गहरी आवाज़ में कुछ अजीब सी बुदबुदाहट के साथ शब्दों को समाप्त करते हुए कहा, कि ये शाम तो, फ़िलहाल शेक्सपियर के नाम है, न कि उनके नाम. मगर, ज़ाहिर था, कि उन्होंने कुछ लोगों को, जो रुक गए थे, अपनी कविताएँ सुनाई थीं. मैं तो रुकने का साहस न कर पाई, चली आई.
’नोवी मीर’ के द्फ़्तर में मिलने से पहले मैंने पास्तरनाक को सिर्फ एक बार देखा था. मज़ेदार बात हुई थी: जब हम सबको, जो कोम्सोमोल्स्क की पत्रिका ‘स्मेना’ से संबंधित साहित्यिक ग्रुप में काम करते थे, शानदार जॉर्जियाई कवि गम्साखुर्दिया ने मेट्रोपोल हॉटेल के अपने कमरे में बुलाया था, मैं वहाँ से भाग आई थी, ये सुनकर कि मेज़बान पास्तरनाक का इंतज़ार कर रहा है (रात का एक बज चुका था). हो सकता है कुछ पूर्वाभास हुआ हो? उनके साथ एक ही मेज़ पर बैठने के ख़याल से ही घबरा गई थी मैं, पावेल वासिल्येव और स्मेल्याकोव के साथ छोटी बच्ची के समान भाग खड़ी हुई. वे दोनों, शराफ़त से मुझे घर पहुँचाकर मेट्रोपोल में वापस लौट आए थे.
एक और मौके पर, जब मैं लिटरेचर-फैकल्टी में पढ़ ही रही थी, मेरा सहपाठी नीका खोल्मिन, जिसके साथ मेरा अल्हड़ अवस्था का पहला संजीदा प्यार चल रहा था, मुझे घसीटकर गेर्त्सेन-हाऊस ले गया, उसी बुल्गाकोव की मासोलित में, जहाँ उत्तेजित प्रशंसकों का हुजूम युवा, बिन्दास पास्तरनाक का इंतज़ार कर रहा था, जो अभी तक ‘मेरी बहन ज़िन्दगी’ के आवेश और ज़ख़्मों को महसूस कर रहा था, साहित्यिक परंपराओं की ‘बाधाओं के ऊपर’ से जा रहा था. वह ‘मारबुर्ग’ सुनाने जा रहा था,  ‘कौए के पंखों जैसे’ बाल बिखरे हुए थे. तालियों का जवाब उसने कुछ अप्रसन्न बुदबुदाहट से दिया, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि स्टेज के पार्श्व में हुई किसी बात से परेशान था. खोल्मिन ने वादा किया कि वो निकट से पास्तरनाक को दिखाएगा, और वह मुझे कॉरीडोर में ले गया. मगर तभी इंटरवल ख़त्म होने की घंटी बजी, और उस शाम की एक ही याद साथ रही: आधे अंधेरे कॉरीडोर में मेरे क़रीब से काले बालों वाला, उत्तेजित व्यक्ति गुज़रा, ज़ाहिर था कि उसने अभी-अभी अपने आप को किसी औरत के कामुक हाथों से छुड़ाया है, और वो ख़ुद भी बिखरा हुआ और उत्तेजित था. जोशीले चुम्बनों की प्रतिध्वनि स्टेज तक उसका पीछा कर रही थी. मैं अपने साथ हॉल में, जहाँ मुझे नीका वापस घसीटकर ले गया था, इन विचित्र आवाज़ों को लेकर आई थी. मतलब, इसने अपनी किसी प्रशंसक का चुम्बन लिया है, शायद उसका, जिसकी आँखें काली हैं, जो बाद में अपनी चौड़ी किनार वाली हैट पहने दूसरी पंक्ति में आकर बैठ गई थी. बाद में मेरे सामने हर बात से इन्कार कर दिया: “ख़ुदा तुम्हें सज़ा देगा ल्याल्युशा!...”
बाद में, जब ये शाम ख़त्म हुई तो भीड़ ने पास्तरनाक को घेर लिया, उसके रूमाल की चिंधी-चिंधी हो गई, उसकी सिगरेटें मसल दी गईं.
काफ़ी बाद में, जब बी.एल., एरेनबुर्ग और मैं पॉलिटेक्निक इन्स्टीट्यूट में हुई ज़बर्दस्त काव्य-संध्या से लौट रहे थे, तो ईल्या ग्रिगोरेविच ने कहा: “ख़ुदा करे, बोर्या कि इस ख़तरनाक कामयाबी से तुम सही-सलामत निकल जाओ”.
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उन पुराने दिनों की उनकी एक तस्वीर मुझे पतले से ‘संकलन’ में मिली. ये एक ग़ज़ब का लम्बा चेहरा था एक छोटी सी नाक के साथ जो चेहरे के अनुपात में नहीं थीं, और नीग्रो जैसे ताँबे के रंग के होंठ. वैसे तस्वीर के थमेपन में पास्तरनाक की कल्पना करना मुश्किल है, और उनके चित्रों पर यक़ीन भी नहीं करना चाहिए. इसलिए नहीं करना चाहिए कि उनके चेहरे पर हमेशा प्रकट होती थी अंतर में सुलगती आग, बच्चों जैसे हाव-भाव, जिसका मुझे यक़ीन हो गया जब वह वास्तविक रूप में सीमोनोव के निमंत्रण पर ‘नोवी मीर’ के संपादकीय दफ़्तर में आए.
कैसे थे वो उस समय? तस्वीर के साथ समानता बिल्कुल भी नहीं थी. हाँ, ख़ूबसूरती और नफ़ासत से भीतर को मुड़ी हुई शानदार नाक, ज़्यादा ही लम्बे, ज़िद्दी, मर्दाने, किसी सरदार के मज़बूत जबड़े वाले मुँह के साथ मेल नहीं खाती थी. फ़ौरन यक़ीन हो जाता था – अगर ‘किस’ करेगा – ‘तो ‘अपने होठों के ताँबे से’. चेहरे का रंग गहरा गुलाबी, किसी स्वस्थ्य आदमी की धूप की झुलस जैसा. आँखों का रंग किसी बाज़ की पीली आँखों जैसा, मगर इस सबके साथ उनमें औरतों जैसी नफ़ासत भी थी.
विचित्र अफ्रिकन देव यूरोपियन पोषाक में. शायद वो देव जिसके लिए तिब्बती लामा आग जलाया करते थे..
तो, अक्तूबर के एक तेवर बदलते हुए दिन में गहरे-लाल कमरे में, कालीन बिछे रास्ते पर गर्मियों के सफ़ेद रेनकोट में वो ख़ुदा प्रकट हुआ, और मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया.
चालीस के दशक के उन दिनों में उसके घोड़े जैसे पीले दाँत, जिनके बीचोंबीच दरार थी, उसके गज़ब के चेहरे को एक अलग ही शोभा दे रहे थे. सन् छियालीस के उनके रूप के बारे में लिखना मेरे लिए मुश्किल है, क्योंकि बाद में वो शानदार रूप से ख़ूबसूरत हो गए थे, और इस बात से बच्चों जैसे ख़ुश भी हो जाते थे. ये सही है कि इससे अपनी पूरी ज़िन्दगी की बेतरतीबी का यक़ीन दिलाने वाला उनका छैलापन ख़त्म हो गया.
तो, सर्वशक्तिमान टेक्नोलॉजी ने उनके अफ्रीकन जबड़े को बदल दिया और हल्का बना दिया. दाँत, जो किसी के भी दाँतों जैसे नहीं थे, बाद में – कितना अपरिचित लग रहा था! – विदेश में बनाए हुए मज़बूत और ख़ूबसूरत दाँतों से बदल दिए गए.
सन् उन्नीस सौ उनसठ में, ख़ुशी से अपने आप को आईने में देखते हुए, अपनी असाधारण ख़ूबसूरती से चकाचौंध हुए और अपने नकली दाँतों समेत मृत्यु की ओर बढ़ते हुए – मानो ये हमेशा से ही ऐसा था – और, हो सकता है, मेरे सामने और अपने आप के सामने हल्के सी ‘पोज़’ बनाते हुए कई बार कहते: “सब कुछ कितनी देर से मिला! ख़ूबसूरती भी, और प्रसिद्धी भी!”
मगर वो ख़ुद नहीं मानते थे कि देर हो चुकी है!
मगर तब, संपादकीय दफ़्तर के कालीन बिछे रास्ते से मेरी ज़िन्दगी में प्रवेश करते हुए, उन्होंने जिस बात से चौंकाया वो था जंगली, सदोष, सटीक शिल्प जैसा व्यक्तित्व – जिसे ऐसे प्रतिभावान शिल्पी ने गढ़ा था जिसे नियमों और अनुपातों का कोई ज्ञान नहीं था. इस प्रतिभावान शिल्पी की छैनी से निकला था वो इन्सान जो किसी जाति का नहीं था, कनपटी तक जाती भौहों के नीचे जड़ी कुछ तिरछी, चमकदार आँखों वाला इन्सान, वो इन्सान जो पूरी दुनिया के कैनवास पर विचरण करने वाला था.      
मतलब, उनके रूप को, जो उनकी ख़ुद की पसन्द के अनुरूप था, सिर्फ थोड़े से तकनीकी सुधार की आवश्यकता थी. जबड़े को थोड़ा छोटा करना पड़ा, प्राचीन ख़ुदा के ताँबे के होठों के नीचे एकदम एक से अमेरिकन दाँत बिठाने थे – और ये रहे, पचास के दशक के पास्तरनाक.
मगर तब...
हमारे कमरे में आया था सन् छियालीस का पास्तरनाक.
मैं खिड़की के पास खड़ी थी – मैं नताशा के साथ लंच के लिए निकलने ही वाले थी.
ज़िनाईदा निकोलायेव्ना ने बड़ी अदा से चुम्बन के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा:
 “बोरिस लियोनीदोविच, मैं आपका परिचय आपकी एक ज़बर्दस्त प्रशंसक से करवाती हूँ,” और इसी तरह का कुछ और भी कहा.
और वो खड़ा था खिड़की के पास वाली मेरी मेज़ के साथ – वो ही, दुनिया का सबसे दिलदार इन्सान जिसे बादलों के, सितारों के और हवा के नाम से बोलने का अधिकार प्राप्त था, जिसने मर्द के आवेग और औरत की कमज़ोरी के बारे में ऐसे शब्द खोज निकाले थे जो अमर हो गए थे.
कितना आनन्ददायक है उन अद्भुत उड़ानों में हिस्सा लेना जो सितारों के बागों तक जाकर सीधे अन्न-नलिका में उतरती हैं, जहाँ तमाम प्यारभरी रातों की बुलबुलों द्वारा निगले गए ये तारे फिसल रहे हैं!                लोग उसके बारे में कहते भी थे: सितारों को अपनी मेज़ पर बुलाता है, दुनिया को – उसके पलंग के पास बिछे कालीन पर.
तब उसके बारे में कौन क्या कहता था, यह जानने की मुझे ज़रूरत नहीं थी! ये तो मैं फिर से अपने आप के लिए कह रही हूँ, अपने आप को ही बता रही हूँ. कितनी ख़ुशी, कितना भय और कितनी उथल-पुथल मेरी ज़िन्दगी में लेकर आया ये इन्सान...
अक्तूबर की हल्की और महीन बर्फ गिर रही थी. मैं अपने युद्धपूर्व के गिलहरी की खाल वाले कोट में दुबकी थी. कमरे में ठण्ड थी.
बी.एल. (बोरिस लिओनीदोविच – अनु.) ने मेरे हाथ पर झुककर पूछा कि उसकी कौन सी किताबें मेरे पास हैं. मगर मेरे पास तो बस एक बड़ा सा संकलन था, जिस पर श्चेर्बिना के समय के साहित्यिक आलोचक बोरिस सोलोव्येव के हाथ से लिखा था : “ल्युस्या को बोरिस की ओर से, मगर उसके प्रिय, इस किताब के लेखक की ओर से नहीं...”.       
कैसी बेवकूफ़ी थी! मगर ये, जो “वो बोरिस नहीं” था, बड़ी अच्छी तरह से दूसरे, मेरे प्रिय, बोरिस को जानता था! हालाँकि उस दिनों नीका ने मुझे सिखाने की बहुत कोशिश की थी, जिसके फलस्वरूप कविता के नियमों को समझे बगैर मैं उनके आकर्षण से सराबोर हो गई थी, मगर इसमें सोलोव्येव की भी भूमिका थी, और हालाँकि मतों और पसन्द में मैं उससे कभी की दूर हो चुकी थी – फिर भी इस बारे में उसकी आभारी हूँ. ग़ज़ब की स्मरणशक्ति होने के कारण वह पास्तरनाक की अत्यंत क्लिष्ट चीज़ों को मुँह ज़ुबानी सुनाया करता और प्रसन्नता एवम् अत्यंत सरलता से रूपकों के गुच्छों को सुलझाया करता; एक धागा खींचो – पूरा गुच्छा खुल जाता है.
तो, मैंने बोरिस लिओनीदोविच को जवाब दिया कि मेरे पास उनकी बस एक ही किताब है.
उन्हें अचरज हुआ:
 “ठीक है, मैं आपको लाकर दूँगा, हालाँकि मैंने सारी किताबें बाँट दी हैं! आजकल मैं अनुवाद कर रहा हूँ, अपनी कविता तो क़रीब-क़रीब नहीं लिखता. शेक्सपियर पे काम कर रहा हूँ. और मालूम है, एक गद्यात्मक उपन्यास के बारे में सोचा है, मगर अभी पता नहीं वो किस तरह का होगा. पुराने मॉस्को में जाने को जी चाहता है, जिसकी आपको याद नहीं होगी, कला के बारे में सोचने को, विचार-विमर्श करने को जी चाहता है.”
और फिर, मुझे याद है, कि थोड़ा सा झिझकते हुए कहा: “कितनी दिलचस्प बात है कि अभी भी मेरे प्रशंसक हैं.”
याद नहीं है कि मैंने उन्हें क्या जवाब दिया. मगर जब नताशा ने मुझे लंच के लिए पुकारा तो मैंने कड़वाहट से जवाब दिया:
 “बस करो, प्लीज़, क्या देख नहीं रही हो कि मैं व्यस्त हूँ!”
 “आह, ख़ुदा,” उसने ज़हरीलेपन से कहा और अकेली ही लंच करने चली गई.
बी.एल. संपादकीय दफ़्तर में कुछ ही देर रुके. उन्होंने ज़िनाईदा हिकोलायेव्ना पीद्दूब्नाया से किसी बारे में बात की, मेरा और उसका हाथ चूमा और चले गए.
पूर्वाभास नामक चीज़, वाक़ई में, होती है, और यह सिर्फ बड़े परिवर्तनों का आभास ही नहीं होता – मुझे पूर्वाभास ने बुरी तरह झकझोर दिया था, जो मेरे ख़ुदा की नज़र से मेरे आर-पार हो गया था.
ये ऐसी आधिकारिक, ऐसी तौलती हुई सी, ऐसी मर्दाना नज़र थी, कि ग़लती हो ही नहीं सकती थी: वो इन्सान आ गया था, वही एक इन्सान, जिसकी मुझे ज़रूरत थी, वह, जो स्वयम् मेरे साथ था. ये एक चौंकाने वाला चमत्कार था.
घर लौटी फिर से भयानक उलझन लिए.
घर पर थी माँ और बच्चे: सात साल की ईरोच्का और घुंघराले बालों वाला, गुबगुबा बच्चा मीत्या. पीछे थे कितने सारे भयानक हादसे: ईरा के पिता - ईवान वासिल्येविच एमिल्यानोव - की आत्महत्या, मेरे दूसरे पति - अलेक्सान्द्र पेत्रोविच विनोग्रादोव - की मौत मेरे हाथों में ‘ओद्दीख’ स्टेशन के अस्पताल में. माँ की अप्रत्याशित और बेवकूफ़ी भरी तीन साल की कैद (स्टालिन के बारे में किसी से कुछ कह बैठी थी). चाहत के और निराशाओं के कई किस्से थे.
और इस सब की, शायद, ज़रूरत थी, उस इकलौते महत्वपूर्ण और निर्विवाद सत्य का स्पष्ट एहसास होने के लिए: मेरे सुदूर के सोलहवें साल से निकल कर आ गया है वो जादूगर - वास्तविक और जीवित..